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Kurukshetra News: जब पाकिस्तान के किले में महिलाओं के कूदने के लिए रख दिए थे गर्म तेल के कढ़ाहे

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कुरुक्षेत्र। विभाजन की दास्तां बताते हुए धर्मचंद गांधी। संवाद
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कुुरुक्षेत्र। पुरुषों को मारा जाने लगा था तो बच्चों को भी बख्शा नहीं जा रहा था। महिलाओं की अस्मत से खेला जाने लगा और उनकी हत्या भी की जाने लगी। इससे बचाने के लिए गांव-गांव लोगों को मुनादी कर घरों से निकाल कर पुलिस के कड़े पहरे में मकबरेनुमा किले में भेज दिया गया। वहां भी विशेष समुदाय के हमले का खतरा बना रहता। ऐसे में गर्म तेल से भरे कढ़ाहे रख दिए गए और महिलाओं को स्पष्ट कहा गया कि यहां भी इस समुदाय के लोगों के हाथों लूटने व मरने की नौबत आए तो उससे पहले इन कढ़ाहों में कूदकर जान दे देना।
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भारत-पाकिस्तान के विभाजन का यह इतना भयावह दौर था, जिसे पीढ़ियां भी भूला नहीं सकती। इसी दौर को याद कर आज भी धर्मनगरी के पुराने शहर गोशाला मोहल्ले में रहने वाले करीब 90 वर्षीय धर्मचंद गांधी की फफक-फफक कर आंखें भर आती हैं। उनके परिवार ने भी यह कड़ी त्रासदी झेली। पाकिस्तान में ही जुल्म का शिकार नहीं हुए बल्कि हिंदुस्तान आने के बाद भी अनेक वर्षों तक वक्त के थपेड़े सहन करने पड़े लेकिन हिम्मत नहीं हारी। कभी अनाज मंडियों में बोरियां ढोकर मजदूरी की तो कभी डेयरी की। न केवल अपने बच्चों को पढ़ाया बल्कि उन्हें सरकारी विभागों में बड़े अधिकारी के पदों तक पहुंचाया।



पिता के पास धोती भी नहीं छोड़ी


धर्मचंद गांधी बताते हैं कि जब पूरा परिवार मुनादी के बाद किले में चला गया तो पिता काम से बाहर गए हुए थे। वे घर लौट रहे थे। अपनी धोती के एक कोने पर अठन्नी बांधें हुए थे। रास्ते में विशेष समुदाय के कुछ लोग मिले तो उन्होंने उससे अठन्नी ही नहीं बदन से पूरे कपड़े भी छीन लिए। वे नग्न अवस्था में एक कुटिया पहुंचे, जहां कुछ कपड़ा मिला तो उसी से तन ढक कर वे किसी तरह किले तक पहुंचे। वहां भी पहले पहचान कराई गई फिर अंदर आने दिया। पिता की यह हालत देख पूरा परिवार रो पड़ा था।
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सब कुछ पाकिस्तान में ही छूटा, खाली हाथ ट्रेन से भेज दिया गया



धर्मचंद गांधी को उम्र के इस पड़ाव में कम सुनाई देने लगा है और आंखें भी धुंधली होने लगी हैं लेकिन इन्हीं में विभाजन की दास्तां भी छिपी है, जो चर्चा करते ही आंसुओं के जरिये निकलने लगती है। वे बताते हैं कि उस समय उनकी उम्र करीब 12 वर्ष थी। उनका पाकिस्तान के मुलतान जिले की मैलसी तहसील में धर्मपुरा गांव था। परिवार में पिता रामा, मां यशोदा, भाई पूजारा राम, देवा राम, शिव पाल के अलावा पूजारा राम की पत्नी जेठी भाई, देवा राम की पत्नी विद्यावंती व शिवपाल की पत्नी सुमित्रा देवी थी। पिता दुकान चलाते थे तो सभी भाई भी अपना-अपना काम करने लगे थे। विभाजन हुआ तो सब कुछ वहीं छूट गया और उन्हें पहले किले में रखा गया तो फिर अन्य लोगों के साथ पूरे परिवार को खाली हाथ ट्रेन के जरिये भारत भेज दिया, जहां वे सीधे कुरुक्षेत्र पहुंचे। यहां कैंप में रखा गया।



घंटों पेड़ के नीचे बैठे रहे, फिर तंबू मिला तो उसमें भी भर गया पानी



धर्मचंद गांधी कहते हैं कि परिवार ट्रेन से कुरुक्षेत्र पहुंचा लेकिन कहीं बीच में ट्रेन पर भी हमला हुआ था। कुरुक्षेत्र में ट्रेन से उतरकर पुरानी तहसील के पास पहुंचे तो घंटों तक एक पेड़ के नीचे भूखे प्यासे बैठे रहे। फिर कैंप के तंबू में ले जाया गया, वहां भी बारिश इतनी हुई कि कई फुट तक पानी भर गया। जान बचाने के लिए बड़े भाई पूजारा राम ने उन्हें घंटोंभर तक पीठ पर उठाए रखा। तीन बार तंबू बदलना पड़ा। फिर उनके साथ कई परिवार गोशाला बाजार क्षेत्र में एक बड़े मस्जिदनुमा भवन में रहने लगे तो मजदूरी कर पेट पालने लगे। यहीं पर वर्ष 1965 तक रहते हुए उनके तीन बेटे व एक बेटी हुई। आज एक बेटा पवन गांधी दिल्ली में सीपीडब्ल्यूडी में एक्सईएन है तो दूसरा सतीश गांधी लोक सेवा आयोग में बतौर अकाउंटेंट तैनात है। तीसरा बेटा राजकुमार तरावड़ी अनाज मंडी में ऑक्सनर है। एक पौत्र न्यूजीलैंड में है।



हर कोई रावण के नाम से जानता



धर्मचंद गांधी बताते हैं कि कुरुक्षेत्र आने पर उन्होंने वर्ष 1953 से ही रामलीला में मंचन करना शुरू कर दिया था। दशरथ व श्रीराम को छोड़कर हर रोल किया। रावण का किरदार इतना प्रभावी रहा कि आसपास के गांवों तक इसी रूप में पहचाना जाने लगा। भतीजा फतेहचंद गांधी आज कुरुक्षेत्र व्यापार प्रकोष्ठ के प्रधान हैं तो वे भी रावण का बेहतरीन किरदार अनेक वर्षों से निभाते रहे हैं। राजनीति में भी अच्छी पहचान बनाई है।

कुरुक्षेत्र। विभाजन की दास्तां बताते हुए धर्मचंद गांधी। संवाद

कुरुक्षेत्र। विभाजन की दास्तां बताते हुए धर्मचंद गांधी। संवाद

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