कुरुक्षेत्र। प्रोफेसर कालोनी के एक घर में लगा आरओ। संवाद
कुरुक्षेत्र। जिले में भूजल का संकट गहराता जा रहा है। विभागीय आंकड़े के अनुसार जिले का औसत भूजल स्तर अब 40 से 45 मीटर तक पहुंच गया है। इसके कारण पूरा जिला अति दोहन की श्रेणी में आते हुए डार्क जोन में चिह्नित हो गया है। जून 2025 में लिए गए आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले वर्ष की तुलना में स्तर करीब एक मीटर और नीचे गिरा है। हालांकि विभाग का कहना है कि भूजल अभी भी पीने योग्य है लेकिन कई ट्यूबवेलों में खारापन आने से लोग आरओ और बोतलबंद पानी पर निर्भर हो गए हैं।
जिले में सबसे ज्यादा भूजल का प्रयोग धान की फसल में कर रहे हैं। ऐसे में अब अगर भूजल के अंधाधुंध दोहन को नहीं रोका गया तो स्थिति और भी खराब हो सकती है। पिछले कुछ वर्षों में बरसात भी सामान्य होने के कारण भूजल रिचार्ज भी नहीं हो पा रहा है। ऐसे में शहर में लोगों को पेयजल उपलब्ध करवाने के लिए लगे ट्यूबवेलों का पानी भी हल्का खारापन दिखाने लगा है। इससे लोगों को पीने के पानी में दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है।
खास तौर पर शाहाबाद, इस्माईलाबाद और पिपली ब्लॉक में खारापन की समस्या बढ़ रही है। परिणामस्वरूप ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के लोग घरेलू आरओ सिस्टम और बोतलबंद पानी पर पूरी तरह निर्भर हो गए हैं।
ऐसे में एक सामान्य परिवार को अब मासिक पानी पर 800-1500 रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़ रहे हैं, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ा रहा है। वहीं जन स्वास्थ्य विभाग की ओर से आपूर्ति किए जा रहे पानी को अन्य कामों के उपयोग में लिया जा रहा है।
विभाग ग्राउंड वाटर सेल प्रभारी महाबीर सिंह के अनुसार जिले में भूजल अभी भी पीने योग्य है। जिले में भूजल की निगरानी के लिए 105 आंकलन केंद्र स्थापित किए गए हैं। ये केंद्र हर मौसम में स्तर मापते हैं और डेटा को राज्य स्तर पर भेजते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार मुख्य कारण धान जैसी पानी की अधिक खपत वाली फसलों का अत्यधिक बोना, पुरानी सिंचाई प्रणाली और वर्षा जल का अपव्यय है।
कुरुक्षेत्र। प्रोफेसर कालोनी के एक घर में लगा आरओ। संवाद
कुरुक्षेत्र। प्रोफेसर कालोनी के एक घर में लगा आरओ। संवाद