स्थाण्वीश्वर महादेव नगर के अधिष्ठाता देव है। इनके नाम पर ही नगर का नाम थानेसर विख्यात है। शास्त्रों के मुताबिक सबसे पहले धरती पर स्थाणु तीर्थ पर ही शिवलिंग की स्थापना और पूजा हुई थी। स्वयं भगवान ब्रह्माजी ने यहां पर शिवलिंग को स्थापित किया था। तब तक कोई भी प्राणी का जन्म गर्भ से नहीं हुआ था। तंत्र शास्त्रों में भी इसका उल्लेख मिलता है। उसके बाद ही ब्रह्माजी ने सृष्टि के कार्य का आरंभ किया और उनके मन से 10 महर्षियों का जन्म हुआ। फिर ब्रह्माजी के दाएं भाग से मनु और बाएं भाग से शत रूपा का जन्म हुआ। तत्पश्चात सृष्टि में गर्भ से प्राणियों की उत्पत्ति प्रारंभ हुई।
महंत बंसी पुरी ने बताया कि वामन पुराण में इसे स्थाणु तीर्थ कहा गया है जिसके चारों ओर हजारों शिवलिंग है। उनके दर्शन मात्र से ही व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है। बताया कि मंदिर के अंदर की छत छतरीनुमा है, जिस पर कलाकृति उभरी हुई है। मंदिर के नजदीक से सरस्वती नदी बहने का उल्लेख मिलता है। मंदिर के ठीक सामने एक कुंड बना हुआ है। मान्यता है कि इसमें नहाने से बीमारियां ठीक हो जाती है। इस कुंड में भी एक दिव्य शिवलिंग स्थापित है।
महंत रोशन पुरी ने बताया कि इस मंदिर पर 24 बार मुस्लिम आक्रमण हुए। मोहम्मद गजनवी ने मंदिर पर आक्रमण करके भगवान नटराज की पांच फीट ऊंची मूर्ति चुरा ली। इन आक्रमण के बाद कई बार मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया। कुछ वर्ष पहले मंदिर में खोदाई के दौरान भगवान कृष्ण की विराट स्वरूप की बेहद ही सुंदर मूर्ति बरामद हुई थी। उसे मंदिर में ही स्थापित किया गया है।
महंत रोशन पुरी ने बताया कि 5158 वर्ष पूर्व महाभारत युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों के साथ स्थाण्वीश्वर महादेव की पूजा करके विजयश्री मांगी थी। गीता में श्रीकृष्ण ने इस तीर्थ पर बताया कि स्थाणु अयं अचलो सनातन: अर्थात स्थाणु भगवान अचल, निर्विकार और प्राचीन है। इससे पहले रावण, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र और महर्षि दधीचि ने यहां तपस्या करके कई तरह सिद्धियां प्राप्त की थी। भार्गव परशुराम ने इसी स्थान पर धर्नुविद्या का ज्ञान प्राप्त किया था।
अर्जुन को मिला पाशुपास्त्र
महंत रोशन पुरी ने बताया कि इस स्थान पर ही भगवान शिव ने अर्जुन को पाशुपास्त्र प्रदान किया था। हिमालय में अर्जुन का केवल सूक्ष्म शरीर ही गया था। राजा हर्षवर्धन ने यहां पूजा अर्चना की और स्थाणु भगवान उनके इष्टदेव थे। उसके बाद उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया था। 625 ई. में यह नगर राजा हर्षवर्धन की राजधानी हुआ करता था।