संवाद न्यूज एजेंसी
पिहोवा। कोरोना महामारी के कारण चैत्र चौदस मेले के आयोजन पर संशय बना हुआ है। वहीं मेले के आयोजन को लेकर बुधवार को पुरोहित वर्ग, ब्राह्मण व साधु समाज का शिष्टमंडल खेल मंत्री संदीप सिंह से उनके चंडीगढ़ निवास पर मिला। शिष्टमंडल ने खेल मंत्री के समक्ष 9 अप्रैल से तीन दिवसीय चैत्र चौदस मेला का आयोजन कराने की मांग रखी। खेल मंत्री संदीप सिंह ने आश्वासन दिया कि मेले के आयोजन को लेकर मुख्यमंत्री मनोहर लाल से बातचीत करेंगे।
शिष्टमंडल में शामिल महंत दीपक गिरी, विक्रम चक्रपाणी, आशीष चक्रपाणी, राकेश पुरोहित, मोहित शर्मा, अक्षय नंदा, मनमोहन चक्रपाणी, वरुण अत्री ने चैत्र चौदस मेले का आयोजन कोविड-19 नियमानुसार कराने की मांग रखी। उन्होंने खेल मंत्री को बताया कि पिछले साल कोरोना के कारण मेला रद्द होने से पुरोहित वर्ग, ब्राह्मण समाज व तीर्थ से जुड़े लोगों को काफी नुकसान हुआ था।
सरस्वती तीर्थ से 1500 से ज्यादा लोगों का गुजारा चलता है। इस बार भी कोरोना पांव पसार रहा है। कोरोना की बढ़ती रफ्तार को देखते हुए स्थानीय प्रशासन की ओर से मेले के आयोजन की तैयारी नहीं की गई है, जिससे पुरोहित वर्ग सहित तीर्थ जुड़े लोग मेला आयोजित कराने की मांग कर रहे है। हरिद्वार में चल रहे कुंभ मेले की तर्ज पर चैत्र चौदस मेले का आयोजन किया जाए। उन्होंने विश्वास दिलाया कि पुरोहित वर्ग कोरोना की गाइडलाइन का पालन करेगा।
वहीं खेल मंत्री संदीप सिंह ने आश्वासन दिया कि चैत्र चौदस मेले के आयोजन को लेकर मुख्यमंत्री मनोहर लाल से बातचीत करेंगे। उल्लेखनीय है कि पिछले साल कोरोना महामारी को देखते हुए चैत्र चौदस मेला रद्द कर दिया गया था। इस साल भी मेले के आयोजन पर संशय बना हुआ है। 9 अप्रैल से मेले का आयोजन होना है, लेकिन अभी तक कोई तैयारी प्रशासन की ओर से नहीं की गई है और न ही प्रशासन ने मेले के आयोजन और रद्द लेकर भी कोई घोषणा की है, जबकि एकादशी से पहले श्रद्धालुओं का आना शुरू हो जाता है।
सतयुग से चला आ रहा मेला
सतयुग से चैत्र चौदस मेला चला आ रहा है। चौदस मेले में पंजाब, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली व जम्मू कश्मीर से पांच लाख से ज्यादा श्रद्धालु सरस्वती तीर्थ पर पहुंचते है। यहां श्रद्धालु अपने पितरों के निमित्त पिंडदान, गति कर्म व तर्पण करके अक्षय मोक्ष की कामना करते है। ग्रंथों व पुराणों में पिहोवा को आध गयाजी की संज्ञा दी गई है। महाभारत युद्ध के बाद भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर युधिष्ठिर ने युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए योद्धाओं की आत्मा की शांति के लिए पिहोवा में ही पिंडदान व तर्पण किया था।