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स्वतंत्रता सेनानी जगीर सिंह ने महज एक कटोरी चावल पर सिंगापुर में बिताए सात साल

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ना दाल ना रोटी, सिर्फ रोजाना मिलने वाले एक कटोरी चावल पर सात साल सिंगापुर में बिताए, इस दौरान खंभों के साथ बांधकर सैनिकों के साथ होने वाले अत्याचारों को भी अपनी आंखों देखा, लेकिन इन अत्याचारों को देखकर भी आजादी के दीवानों के पैर नहीं डगमगाए। आखिरकार आजाद देश भारत में खुली हवा में सांस लेने का मौका मिला। ये दास्तान है आईएनए के सिपाही स्वतंत्रता सेनानी जगीर सिंह की, जिसे उनके बेटे त्रिलोचन सिंह वासी कराह साहिब ने अमर उजाला के साथ सांझा किया। त्रिलोचन सिंह ने बताया कि उनका बचपन और जवानी नेता जी सुभाष चंद्र बोस की बहादुरी और वीरता के किस्से सुनकर बीता, उनके पिता जगीर सिंह नेता जी के किस्से सुनाकर उनमें जोश भर देते थे। भले ही उनके पिता जगीर सिंह आज इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उनकी बातें आज भी उनको हिम्मत और जोश देते है। बता दे पिछले साल 8 जुलाई को जगीर सिंह का निधन हो गया तथा राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।
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त्रिलोचन सिंह ने बताया कि उनके पिता जगीर सिंह का जन्म 1921 में पंजाब के बल्लू माजरा में हुआ था। खेतीबाड़ी करके वह अपने परिवार का पालन करते थे। वे शुरू से नेताजी सुभाष चंद्र बोस से काफी प्रभावित थे, उनसे प्रभावित होकर उन्होंने 1939 में अंबाला छावनी में आईएनए में भर्ती हुए थे। आईएनए में भर्ती होने के बाद उन्हें रोड स्टार, जौहर बारु के बाद सिंगापुर में देश सेवा करने का अवसर मिला। सिंगापुर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के कई बार विचार भी सुने। उन्होंने बताया कि सिंगापुर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उनके पिता व अन्य सैनिकों को एकत्रित करके अपने भाषण में कहा था कि सभी अपने देश को लौट जाओ, मैं अब सिंगापुर छोड़कर जा रहा हूं। हमारा सिंगापुर में जितना कार्य और मकसद था वह पूरा हो चुका हैं अब सभी आजाद देश भारत में मिलेंगे, लेकिन इसके बाद कभी नेता जी नहीं मिले और न ही उनकी आवाज सुनने को मिली। नेता जी के वहां से जाने के बाद सिंगापुर में हड़ताल होने के कारण स्थिती दिन-प्रतिदिन बिगड़ती गई तथा उनको सात साल सिंगापुर में बिताने पड़े थे। जहां उनको न रोटी मिली न ही दाल, सिर्फ रोजना एक कटोरी मिलने वाले चावल से गुजारा करना पड़ा था। इस दौरान उन्होंने सैनिकों के साथ हुए अत्याचारों को भी अपनी आंखों से देखा।
इस दौरान उनको वहां नेताजी की मृत्यु की सूचना भी मिली, जिस पर किसी को विश्वास नहीं हुआ था, लेकिन नेताजी के प्रयासों से देश को आजादी मिल गई, वे वापस अपने आजाद देश में भी आ गए लेकिन उनको दोबारा नेताजी की आवाज नहीं सुनने को नहीं मिली। उन्होंने बताया कि उनके पिता जगीर सिंह ने कभी नेताजी की मौत का विश्वास नहीं किया और हरदम उनकी सलामती की दुआ भी की। अपने आखिरी समय में भी उन्होंने नेताजी से मिलने की उम्मीद को नहीं छोड़ा। आज भले ही उनके पिता जगीर सिंह उनको साथ नहीं है, लेकिन उनकी बातें आज भी उनको व उनके बच्चों के लिए प्रेरणा है। उनके पोते-पड़पोते उनके दिखाए रास्ते पर ही चल रहे है।
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