कुरुक्षेत्र। हैरिटेज विलेज में प्रस्तुत की गई सांझी। स्वंय
कुरुक्षेत्र। विरासत हेरिटेज विलेज में सांझी उत्सव पूरे उत्साह के साथ मनाया जा रहा है, जिसमें सांझी के विविध स्वरूप देखने को मिल रहे हैं। सांझी लोकजीवन में बालिकाओं द्वारा बनाई जाने वाली एक ऐसी प्रतिमूर्ति है जिसे लोक में देवी की संज्ञा भी दी गई है। सांझी सबकी साजली देवी के रूप में लोक कलात्मक अभिव्यक्ति है। अनादि काल से गांव में कुंवारी कन्याएं सांझी बनाती आ रही हैं। सांझी की हर रोज घर में बालिकाओं द्वारा पूजा की जाती है और गीत गाकर उसकी अराधना भी की जाती है। सांयकालीन हर रोज बालकाएं पहले सांझी की पूजा करती हैं और उसके बाद खाना खाती हैं।
सांझी उत्सव के संयोजक अभिनव पूनिया ने बताया कि लोकगीतों में सांझी रची एवं बसी हुई है। बालिकाएं सांझी को सुबह खाना खिलाने से पहले जगाते हुए यह गीत गाती हैं- जाग सांझी जाग.. तेरै मात्थै लाग्या भाग.. बालिकाएं जब सांझी माई को खाना खिलाती हैं तो यह गीत गाती हैं- जीम ले हे जीम ले, सांझी माई जीम ले।
सांझी माई इस सवाल के जवाब में उत्तर देती है, लाड्डू जीमूंगी पेड़ा जीमूंगी, अमृत की चलू भराऊंगी। जीम ले हे जीम ले, सांझी माई जीम ले। बालिकाएं गीत गाती हुई वस्त्र, आभूषण पहनने के संबंध में सांझी माई से पूछती हैं, के ओढ़ेगी के पहरेगी, क्याहेंं की मांग भरवावैगी। इस सवाल के जवाब में सांझी गीत के माध्यम से ही उत्तर देती है, शालू ओढूंगी दामण पहरूंगी, रोला की मांग भरवाऊंगी। अभिनव पूनिया ने बताया कि सांझी को जीमाने के पश्चात बालिकाएं एवं महिलाएं मिलकर सांझी का आरता एवं आरती गाती हैं, आरता हे आरता, सांझी माई आरता।
सांझी के विषय में कहा जाता है कि यह नवरात्रों में अपने ससुराल जाती है। इसके ससुराल जाने के पश्चात गांव के बाग सूख जाते हैं और इसका भाई इसको लेने के लिए जाता है। वास्तव में सांझी भाई-बहन के प्रेम का भी द्योत्तक है।
कुरुक्षेत्र। हैरिटेज विलेज में प्रस्तुत की गई सांझी। स्वंय