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जान लेने वाले आगे आए जीवन बचाने को

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सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन जिला कारागार में जघन्य अपराधों में शामिल लगभग 35 बंदियों व सजायाफ्ता कैदियों ने नई पहल की है।
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भले ही इन कैदियों ने किसी की जान ली हो, किसी को लूटा हो अथवा डकैती और बलात्कार किया हो, लेकिन अब उन्होंने मृत्यु उपरांत अंगदान करने का प्रण लिया है। ताकि उनके शरीर के अंगों से किसी जरूरतमंद को जीवन मिल सके।

उन्होंने संकल्प के बारे में जेल प्रशासन और प्रदेश सरकार को भी अवगत करा दिया है। उन्होंने जेल अधीक्षक और विधायक सुभाष सुधा को संकल्प पत्र सौंपकर शरीर दान करने की इजाजत मांगी है। वे रेडक्रॉस के माध्यम से गणतंत्र दिवस के अवसर पर शपथपत्र देकर शरीर दान करने की इच्छा जता चुके हैं।
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ऐसे बही बदलाव की बयार
कैदियों की मानें तो वे जेल के प्रशासन द्वारा समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी बताने व विभिन्न संस्थाओं द्वारा समय-समय पर सत्संग व आध्यात्मिक कार्यक्रमों से बेहद प्रभावित हुए हैं। उन्हें इन संदेशों ने झकझोर दिया है।


किसी भी परिस्थिति के कारण अपराध करने वाले व जेलों में सजा भुगत रहे लोगों के प्रति आम लोगों की धारणाएं अकसर नकारात्मक होती है, उनका मकसद है कि इस धारणा को भी बदला जाए और अपराध से निकल कर भी कोई व्यक्ति मुख्यधारा में फिर से शामिल होकर समाज के लिए महान कार्य कर सकता है।

अभी 35 कैदियों व बंदियों ने शरीर दान करने का संकल्प लिया है जबकि कई अन्य कैदी व बंदी भी उनकी इस सोच से काफी प्रभावित हो रहे हैं। कैदी व बंदियों द्वारा दिए गए शरीर दान के संकल्प पत्र उन्होंने जिला उपायुक्त तथा जेल महानिदेशक को भेजकर आवश्यक दिशा-निर्देश देने की मांग की है। एक पत्र मानव अधिकार आयोग को भी भेजकर अवगत कराया है।
-सोमनाथ जगत, जेल अधीक्षक, कुरुक्षेत्र।


बेहद सराहनीय कदम : सुभाष सुधा
विधायक सुभाष सुधा का कहना है कि कैदी व बंदियों की ओर से उन्हें यह पत्र दिया गया है। इस बारे में सरकार को अवगत करवा दिया जाएगा। उनके द्वारा उठाया गया यह कदम बेहद ही सराहनीय एवं अनुकरणीय है। इससे दूसरे आपराधिक लोगों व आम लोगों को भी प्रेरणा मिलेगी।


केस स्टडी : 1
नाम : संदीप
अपराध : सामूहिक दुराचार, धमकी देना। थाना पिहोवा।
सजा : आजीवन कारावास
-20 जून 2011 से कुरुक्षेत्र जेल में बंद।

कैदी भी इंसान है, होता है पश्चाताप
सजायाफ्ता कैदी संदीप का कहना है कि अपराध करते हुए मनुष्य की सकारात्मक सोच समाप्त हो जाती है। लेकिन, बाद में उसे पछतावा बहुत होता है, लेकिन जेलों में बंद अपराधी भी इंसान होते हैं। वक्त के साथ-साथ सकारात्मक सोच इंसान को बदल सकती है। ऐसा ही जेल प्रशासन द्वारा एक पहल से मेरी सोच बदली है। मैं अब अपना शरीर दान कर अपने जीवन को सफल बनाना चाहता हूं और अपनी गलती को सुधारना चाहता हूं।

केस स्टडी : 2
नाम : प्रवेश   
अपराध : हत्या, अपहरण, अप्राकृतिक यौनाचार, धमकी देना। थाना शहर।
सजा : आजीवन कारावास
-22 मार्च 2008 से कुरुक्षेत्र जेल में बंद।

समय के साथ बदलती है इंसान की सोच
आजीवन कारावास की सजा काट रहे प्रवेश का कहना है कि जिस समय अपराध किया, उस समय की सोच और आज की सोच में जमीन आसमान का अंतर आ चुका है। जेल की चारदिवारी के भीतर आकर अकेले पड़े तो पता लगा कि गुनाह कितना संगीन है। पहले जान लेने के लिए जोर नहीं पड़ा, लेकिन अब समझ में आता है कि जब जीवन दे नहीं सकते हैं तो लेने का भी अधिकार नहीं। बस अब इंसानियत के लिए कुछ करना चाहता हूं, इसलिए मरणोपरांत अंगदान करने की इच्छा है। ताकि किसी जरूरतमंद के काम आ सके।
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केस स्टडी : 3
नाम : सुखदेव
अपराध : हत्या का प्रयास, बंधक बनाना, अपहरण, धोखाधड़ी समेत अन्य धाराओं में मामले दर्ज।
अंडर ट्रायल बंदी।  
-20 मई 2012 से कुरुक्षेत्र जेल में अंडर ट्रायल।

अपराध कर जिंदगी से दूर हो गए
अपराध करने के बाद कुछ नहीं मिला। जिंदगी अपने लोगों के बीच होती है, लेकिन जिंदगी से ही दूर हो गए। अब पछतावा होता है कि इंसान के रूप में जन्म लेकर गलत दिशा में चले गए। इसलिए मन को ठीक कर सोच बदलने का प्रयास कर रहा हूं। जीते जी तो किसी के काम नहीं आ सकते हैं, लेकिन अंगदान कर दूसरे लोगों के किसी काम आ सकूं, इसलिए ही संकल्प लिया है।
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