कुरुक्षेत्र। अब किसी भी प्रकार की बीमारी से फसल खराब नहीं होगी। बीमारी की शुरूआत होते ही पता चल सकेगा तो इसका तत्काल इलाज भी शुरू कर फसल को नुकसान होने से बचाया जा सकेगा। यह सब पूरी तरह से तकनीक पर आधारित रहेगा। इसके लिए राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) कुरुक्षेत्र के प्रोफेसर डॉ. जितेंद्र कुमार छाबड़ा और छात्रों ने ऑटोमेटिक और शुरुआती पहचान और नियंत्रण प्रणाली विकसित की है, जिसे पेटेंट भी मिल चुका है।
इस तकनीक को अपनाने से किसानों को बड़ी राहत मिलेगी। इसके साथ ही फसल खराब होने की चिंता भी कम होगी। किसानों के लिए खेती में सबसे बड़ी चुनौती पौधों की बीमारियों को समय रहते पहचानना और सही दवा का इस्तेमाल करना होता है। अक्सर किसान पत्तियों को देखकर बीमारी समझने की कोशिश करते हैं, लेकिन सही पहचान न हो पाने या देर से पता लगने पर फसल को भारी नुकसान हो जाता है। इसी से बचाव के लिए यह प्रणाली विकसित की गई है।
प्रो. जितेंद्र बताते हैं कि जैसे ही बीमारी की शुरुआत होगी, किसान को तुरंत मोबाइल पर नोटिफिकेशन मिलेगा। कंप्यूटर में कृषि विशेषज्ञों द्वारा सुझाई गई दवाओं का पूरा डाटाबेस पहले से मौजूद होगा। सिस्टम यह तय करेगा कि कौन सी दवा कितनी मात्रा में और कितने समय तक छिड़कनी है। किसान मोबाइल एप से एक क्लिक कर स्प्रिंकलर ऑन कर सकेगा।
एनआईटी के कंप्यूटर इंजीनियरिंग विभाग के प्रो डॉ. जितेंद्र कुमार छाबड़ा के निर्देशन में छात्र गौरव, निश्चय चौहान और गर्विता ने मिलकर इस तकनीक को विकसित किया है। इसमें एआई, मशीन लर्निंग, क्लाउड कंप्यूटिंग, इमेज प्रोसेसिंग और मोबाइल एप्लीकेशन का अद्भुत मेल है। इस तकनीक से न केवल खेतों में फसल सुरक्षित रहेगी, बल्कि कम खर्च में ज्यादा उपज भी हासिल की जा सकेगी। किसान कहीं से भी मोबाइल से पूरे सिस्टम को कंट्रोल कर सकेंगे। इससे समय और मेहनत दोनों की बचत होगी। किसान जरूरत के हिसाब से कैमरों और स्प्रिंकलरों की संख्या को बढ़ा या घटा सकते हैं।
फसल में स्प्रे का रिकॉर्ड कंप्यूटर में रहेगा सुरक्षित
प्रो. जितेंद्र कुमार ने बताया कि स्प्रिंकलर अपने-आप निर्धारित मात्रा में दवा का छिड़काव करेंगे। इतना ही नहीं, हर बार हुए स्प्रे का पूरा रिकॉर्ड कंप्यूटर में सुरक्षित रहेगा, जिससे भविष्य में भी किसानों को मदद मिलेगी। इस प्रणाली की सबसे बड़ी ताकत है रियल टाइम और शुरुआती इलाज। जैसे ही बीमारी की पहचान होगी, उसी समय दवा छिड़की जा सकेगी। किसान को पत्तियां तोड़कर लैब भेजने या घंटों खेत में बीमारी ढूंढने की जरूरत नहीं रहेगी। बीमारी की पहचान शुरुआती चरण में ही हो जाएगी।
ऐसे काम करेगी तकनीक
प्रो. जितेंद्र कुमार ने बताया कि यह प्रणाली कैमरे, कंप्यूटर सिस्टम, मोबाइल एप और स्प्रिंकलर के नेटवर्क पर आधारित है। खेतों में लगाए गए कैमरे समय-समय पर पौधों की पत्तियों की तस्वीर खींचेंगे। ये तस्वीरें सीधे कंप्यूटर सिस्टम तक पहुंचेंगी, जहां पहले से मौजूद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और मशीन लर्निंग मॉडल तस्वीरों का विश्लेषण कर बीमारी पहचान लेंगे।
कुरुक्षेत्र। प्रो. डॉ. जितेंद्र कुमार छाबड़ा।