कुरुक्षेत्र। ऐसा माना जाता है कि एक सफल व्यक्ति के पीछे महिला का हाथ होता है, लेकिन महिलाओं की सफलता के पीछे भी परिवार की अहम भूमिका होती है। यह कहना है कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मैनेजमेंट की प्रोफेसर एवं भगत फूल सिंह महिला विश्वविद्यालय खानपुर कलां (सोनीपत) की नवनियुक्त कुलपति डॉ. सुदेश चिकारा का। उनका मानना है कि महिला सशक्तीकरण के लिए शिक्षित होना बेहद जरूरी है।
सोनीपत में जन्मी प्रो. सुदेश चिकारा की स्कूली शिक्षा मोतीलाल नेहरू स्पोर्ट्स स्कूल राई से हुई। प्रो. चिकारा ने शिक्षा ही नहीं, खेल जगत में भी राष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम चमकाया, लेकिन इसमें भविष्य दिखाई न देते हुए सुदेश चिकारा ने पढ़ाई जारी रखने का निर्णय लिया।
प्रो. चिकारा के पिता खजान सिंह शिक्षक और मां रामकौर गृहिणी थी। सीमित साधन होते हुए भी सुदेश चिकारा को परिजनों ने एमडीयू रोहतक से उच्च शिक्षा दिलाई। उन्होंने भी अपने माता-पिता का सपना पूरा करने के लिए जीवन में संघर्ष किया। उस वक्त उन्हें ब्रिटिश काउंसिल स्कॉलरशिप मिलती थी। प्रो. चिकारा बताती हैं कि आज उन्हीं की बदौलत इस मुकाम पर पहुंची है। उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में 32 साल सेवाएं देते हुए कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय महिला शोध केंद्र की निदेशक सहित कई अहम जिम्मेदारियां निभाई हैं। खास बात यह है कि प्रो. चिकारा के पति प्रो. हवा सिंह कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव रहे हैं। इतना ही नहीं, उनके पुत्र अभिमन्यु भारतीय सेना में मेजर के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। वहीं, पुत्रवधू आईएएस ईशा वाराणसी विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष हैं और पुत्री तेजवनी पीएचडी कर रही है।
हर दिन नई चीज सीखने की कोशिश करती हैं प्रो. मंजुला चौधरी, 36 वर्ष की आयु में बन गई थी प्रोफेसर
- सफलता यूं ही नहीं मिलती, संघर्ष से करना पड़ता है प्यार, मुकाम हासिल करने के लिए सकारात्मक विचार, कड़ी मेहनत और आत्म विश्वास बेहद जरूरी : प्रो. मंजुला
कुरुक्षेत्र। सफलता यूं ही नहीं मिलती, इसके लिए संघर्ष से प्यार करना पड़ता है। सकारात्मक विचार, कड़ी मेहनत और आत्मविश्वास के साथ कोई भी मुकाम हासिल किया जा सकता है। आज भी संघर्ष जारी है। हर दिन नई चीज सीखने की कोशिश करती हूं। यह कहना है कुरुक्षेत्र विवि. के पर्यटन और होटल प्रबंधन विभाग की प्रोफेसर एवं डीन एकेडमिक अफेयर्स प्रो. मंजुला चौधरी का।
प्रो. मंजुला चौधरी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की ऐसी महिला प्रोफेसर हैं, जो 36 वर्ष की आयु में (वर्ष 1999) प्रोफेसर बन गई थी। इससे पहले उन्होंने वर्ष 2010 से 14 तक भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन संस्थान भारत सरकार (आईआईटीटीएम) में निदेशक के पद पर रहीं। खास बात यह है कि प्रो. मंजुला चौधरी की स्कूली शिक्षा उत्तराखंड से हुई, लेकिन स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से की। पिछले 37 वर्षों से कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पर्यटन और होटल प्रबंधन विभाग में पढ़ाई कर रहे विद्यार्थियों का भविष्य संवार रही हैं। प्रो. मंजुला चौधरी का कहना है कि मुझे लगता है कि हर कदम बढ़ाने के पीछे प्रतिबद्धता, जुनून और दृढ़ता के साथ खुद पर विश्वास था। कहा कि एक नई पहल, थोड़ा अतिरिक्त प्रयास और लगन ने सब कुछ बदल दिया, लेकिन किसी भी समय मुझे ऐसा नहीं लगा कि मैं किसी से पीछे हूं। वे पिछले तीन साल से विश्वविद्यालय में डीन एकेडमिक अफेयर्स की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। इससे पहले भी काफी सारी जिम्मेदारियां संभाली। कहा, इस संघर्ष भरे जीवन में एक दिशा देने के साथ-साथ मुझे बहुत कुछ सिखाया।
प्रो. चौधरी का कहना है कि मंजिल हासिल करना मुश्किल हो सकता है लेकिन असंभव नहीं। कुछ महिलाएं चुनौतियों से घबराकर अपने कदम पीछे रख लेती हैं, लेकिन जिस क्षण वे अपने विचारों को बदल लेंगी, वह दिन दूर नहीं जब सफलता उनके कदम चूमेगी। उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी समाज में लंबे समय से चली आ रही अतार्किक मान्यताओं से बंधे होने के बजाय खुद पर विश्वास करे और अपने जीवन का निर्माण करे। कहा कि आज हमारी बेटियां सपना ही नहीं देख रहीं, बल्कि बुलंदियां भी छू रही हैं।
पहली कक्षा से स्नातक तक टॉप थ्री बच्चों में रही प्रो. नीलम ढांडा, आज केयू के महिला छात्रावास की चीफ वार्डन
-लक्ष्य हासिल करने के लिए दृढ़ निश्चय जरूरी, सीमित संसाधन में भी हासिल की जा सकती है कामयाबी : प्रो. ढांडा
कुरुक्षेत्र। पहली कक्षा से स्नातक (बीकॉम) तक टॉप थ्री बच्चों में शामिल रही कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नीलम ढांडा आज महिला छात्रावास की चीफ वार्डन के रूप में जिम्मेदारी संभाल रही है। खास बात यह है कि कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर, एमफिल और पीएचडी की पढ़ाई करने वाली प्रो. नीलम ढांडा आज विश्वविद्यालय के वाणिज्य विभाग में प्रोफेसर के पद पर सेवाएं दे रही हैं।
प्रो. ढांडा बताती हैं कि परिवार में सबसे बड़ा बच्चा होने के नाते सबसे ज्यादा जिम्मेदारी उन्हीं के सिर पर थी, लेकिन जीवन में मिलने वाली हर जिम्मेदारी और चुनौती को स्वीकार कर अच्छा करने का प्रयास रहता है। माता-पिता की प्रेरणा से जिंदगी में कभी उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। गुरुग्राम के गांव झरसा में जन्मी नीलम ढांडा ने कक्षा 10वीं तक की पढ़ाई गांव के ही राजकीय उच्च विद्यालय से की। नीलम ढांडा की माता गुलाब कौर व पिता करतार सिंह दोनों ही शिक्षाविद थे। उन्होंने आज की युवा पीढ़ी को मूल मंत्र देते हुए कहा कि लक्ष्य हासिल करने के लिए दृढ़ निश्चय जरूरी है। सीमित संसाधन में भी कामयाबी हासिल की जा सकती है। आज बाजारीकरण का दौर है।
प्रो. मंजुला चौधरी।- फोटो : Kurukshetra
भगत फूल सिंह महिला विश्वविद्यालय खानपुर की वीसी प्रो. सुदेश चिकारा। संवाद- फोटो : Kurukshetra