संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। आज वीरवार को अहोई अष्टमी पर्व पर माताएं निर्जल रहकर अपने बच्चों की लंबी दीर्घायु व अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए व्रत रखेगी। अहोई अष्टमी के दिन माताएं अपने पुत्रों की भलाई के लिए उषाकाल (भोर) से लेकर गोधूलि बेला (सांझ) तक उपवास करती हैं और सांझ के दौरान आकाश में तारों को देखने के बाद व्रत तोड़ा जाता है। करवा चौथ के समान ही अहोई अष्टमी भी प्रसिद्ध है। अहोई अष्टमी का दिन अहोई आठे के नाम से भी जाना जाता है। इसीलिए बुधवार को बाजारों में महिलाओं की भीड़ लगी रही।
सुबह से ही थानेसर बाजार, कच्चा घेर, गोशाला बाजार, सीकरी चौक व सेक्टरों की मार्केट में चहल पहल रही। खासकर बर्तन की दुकान व मिट्टी के बर्तन बेचने वालों पर लंबी लाइन लगी रही। अहोई अष्टमी की पूजा के लिए कैलेंडर का विशेष महत्व है। इस बार बाजार में अलग-अलग साइज के कैलेंडर व अहोई अष्टमी की तस्वीर उपलब्ध है। 12 बाई 18 साइज का कैलेंडर पिछले दो सालों से ही चलन में आया है जबकि इससे पहले छोटा कैलेंडर ही चलन में था।
बिक्री में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी
अग्रवाल स्टेशनरी संचालक राकेश ने बताया कि उनका कैलेंडर व तस्वीरों का होलसेल का काम है। कोराना काल के दौरान जहां इनकी बिक्री काफी कम रही। वहीं इस बार की बिक्री में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। हालांकि कुछ लोग घर की दीवार पर भी चित्र बनाकर पूजा अर्चना करते है।
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मिट्टी के बर्तन की बढ़ी बिक्री: प्रमोद
मिट्टी के बर्तन व पूजा सामग्री बेचने वाले प्रमोद का कहना है कि बुधवार को सुबह से लेकर शाम तक अहोई पूजा में प्रयोग होने वाले मिट्टी के बर्तन की खूब बिक्री होती रही। आज दोपहर तक भी बर्तन की खरीदारी की जाएगी। सभी बर्तन के दाम अलग-अलग है। बर्तन 70 से 150 रुपये तक बिक रहे है।
स्टील की बर्तनों का बढ़ा चलन: उमेश बंसल
उमेश बंसल ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में मिट्टी के बर्तन (जकरा-जकरी) की जगह स्टील के बर्तन भी चलन में आ गए है। मिट्टी के बर्तन को पूजा करने के बाद दोबारा से पूजा में नहीं लिया जाता जबकि स्टील के बर्तन कई सालों तक चलते हैं। इसलिए लोग मिट्टी की बजाय स्टील के बर्तनों को खरीदते हैं।
संतान की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं माताएं
सपना ने बताया कि संतान की प्राप्ति व लंबी उम्र के लिए सभी माताएं निर्जल रहकर व्रत करेंगी। दोपहर को माता अहोई अष्टमी की व्रत कथा सुनने के बाद ही जल ग्रहण किया जाएगा। सुबह को दीवार पर अहोई अष्टमी का चित्र बनाकर शाम को पूजा अर्चना की जाएगी तथा तारों को जल अर्पित करने के बाद बाणा निकालकर व्रत पूरा होगा।