कुरुक्षेत्र। पश्मीना शॉल दिखाता शिल्पकार मुश्ताक अहमद।
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कश्मीर की पश्मीना शॉल के देश ही नहीं विदेश में भी कद्रदान हैं। यूरोपीय व मुस्लिम देशों में पश्मीना शॉल खूब पसंद की जाती है। अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव में कश्मीरी शिल्पकारों की पश्मीना शॉल के अच्छे खासे कद्रदान है। देश में बिकने वाली शाल का वजन तकरीबन 400 से 500 ग्राम के बीच रहता है। विदेशी शॉल महज 25 ग्राम वजनी है। दुबई, सऊदी अरब व इराक सहित अन्य देशों में पश्मीना शॉल अच्छी खासी निर्यात होती है।
पश्मीना शॉल लेकर पहुंचे शिल्पकार मुस्ताक अहमद व जहूर ने बताया कि का कहना है कि देश भर में आयोजित छह शिल्प मेलों में वे अपना हुनर प्रदर्शित दिखाते हैं। कोरोना काल के पौने दो वर्ष बाद शिल्प मेलों की शुरुआत हुई है। अब राजस्थान के उदयपुर, गुजरात व अन्य प्रदेशों में लगने वाले शिल्प मेलों से उन्हें कुछ आमदनी होने की उम्मीद जगी है। उन्होंने अपने कारोबार को चलाने के लिए 40 लाख का ऋण लिया हुआ है। उनके साथ करीब 600 कारीगर भी जुड़े हुए है, जोकि पश्मीना शॉल से लेकर अलग-अलग कारीगरी करते हैं मगर कोरोना के चलते उन्हें ऋण चुकता करने और शिल्पकारों का मेहनताना देने में परेशानी का सामना करना पड़ा।
पहाड़ी जानवरों की कांटों में फंसें बालों की ऊन से बनाई जाती है शॉल
शिल्पकार मुस्ताक अहमद ने बताया कि पश्मीना शॉल लोम पर बनाई जाती है। इसकी बनावट के लिए पहाड़ी जानवरों के कांटों में फंसे बालों को इस्तेमाल किया जाता है। इनमें प्रमुख रूप से याक, खरगोश व भेड़-बकरी अन्य जानवर शामिल हैं, जो पहाड़ों की चरगाह में जाते हैं। उनके बाल पेड़ों की झाड़ियों में फंस जाते हैं, जिन्हें कारीगर एकत्रित करते हैं फिर उन्हें बारीकी रूप से काता जाता है। इस मेहनत के बाद भी एक साल में पश्मीना शॉल बनाने में एक साल का वक्त लगता है।