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अल्ट्रासाउंड के लिए रातभर देते ईंट-पर्ची का पहरा 

Sun, 24 Apr 2016 01:34 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला/करनाल
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उपचार - फोटो : अमर उजाला
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सीएम सिटी करनाल की तस्वीर देखिये। रात के आठ बजे हैं और कल्पना चावला मेडिकल कालेज की पर्ची खिड़की के बाहर लाइन लग जाती है। रात के दस बजते हैं तो लाइन में लगे लोगों को झपकी आने लगी है, ऐसे में सभी ने सहमति से फैसला लिया लाइन के हिसाब से ईंटों को लाइन में लगाया जाए और उसके नीचे अपनी आईडी रखी जाए। अब सब सो गए हैं, लेकिन रात को सभी एक एक दो बार उठते हैं कि कहीं ईंट आगे व पीछे न हुई हो। हालांकि, मच्छरों के कारण खुले आसमान के नीचे ठीक से वे सो नहीं पाते। जैसे ही सुबह होती है कि सभी बिना नहाये ही खिड़की के सामने फिर से लाइन में लग जाते हैं अल्ट्रासाउंड कराने के लिए।
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यह है स्मार्ट सिटी बनने के दौड़ रहे करनाल की असली तस्वीर। यह सरकार के तमाम दावों की पोल खोलती है, डाक्टरों की कमी के कारण और गरीबी के कारण लोग निशुल्क अल्ट्रासाउंड कराने के लिए एक रात पहले ही लाइनों में लग जाते हैं। सीएम सिटी करनाल की दास्तां देखिये। पहले यहां अल्ट्रासाउंड के लिए भरी दोपहर में सड़क पर जाम लगाना पड़ता था। आनन फानन में प्रबंधन ने रेडियोलाजिस्ट का जुगाड़ किया, लेकिन अभी लोगों की समस्याएं खत्म नहीं हुई है। नई समस्या यह है कि लोग अब एक रात पहले ही अस्पताल में आकर लाइन में लग जाते हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि सुबह उनका नंबर आने वाला नहीं है, क्योंकि भीड़ ज्यादा होगी और रेडियोलाजिस्ट है एक, वो भी उधार का। अमर उजाला टीम ने शुक्रवार रात को मेडिकल कालेज का दौरा किया तो ये तस्वीर सामने आई। 

रातभर मच्छर काटते हैं, डॉक्टर का पता नहीं 
रातभर अपने नंबर के लिए गर्भवती महिलाएं व अन्य सदस्य लाइन में लगते हैं। अब यह नियम बन गया है कि जो रात को आएगा अपनी एक ईंट उठाकर ईंट के पीछे ईंट रख देगा, साथ ही उसके नीचे अपनी आईडी भी। सुबह भी इसी हिसाब से लाइन चलती है। अहम बात यह है कि अल्ट्रासाउंड के लिए लोग रातभर मच्छरों के बीच सोते हैं, पर सुबह कई बार डाक्टर नहीं आने पर उनकी सारी मेहनत बेकार चली जाती है। क्योंकि रेडियोलॉजिस्ट को खानपुर मेडिकल कालेज से बुलाया गया है। 
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50 गर्भवती महिलाएं आती, 20 के होते अल्ट्रासाउंड
मेडिकल कालेज एवं अस्पताल में रोजाना 1400 मरीज आते हैं। इनमें अल्ट्रासाउंड करवाने के लिए गर्भवती महिलाओं की संख्या 50 के करीब रहती है और रोजाना 15 से 20 महिलाओं को ही अल्ट्रासाउंड हो पाता है। ऐेसे में महिलाओं में पहला नंबर पाने की होड़ रहती है और वह एक दिन पहले ही अस्पताल में मौजूद रहती हैं। ऐसे में जिन महिलाओं के टेस्ट नहीं हो पाते वे रात को ही अपना नंबर लगाने के लिए वहीं पर सो जाती हैं, या फिर उनके परिवार वाले अस्पताल में डेरा जमाते हैं। 

पर्ची से लेकर डॉक्टर के चेकअप तक परेशानी 
गर्मी बढ़ गई है और मच्छरों की भी भरमार है। इस माहौल में अस्पताल के पंजीकरण केंद्र के सामने सोने को मजबूर हैं। शिव कालोनी वासी शशी, सदर बाजार वासी ममता देवी ने बताया कि अस्पताल में गर्भवती महिलाएं सारा दिन लाइनों में भूखी प्यासी लाइनोें में रहती है। पहले पर्ची कटवाने के लिए, फिर डॉक्टर से चैकअप के लिए और इसके बाद अल्ट्रासाउंड पर्ची पर नंबर लगवाने के लिए जंग जीतने पड़ती है। उसके बाद दवाई लेने के लिए लंबी लाइन में लगना पड़ता है। 

शाम को मरीज अस्पताल में डालते डेरा 
अल्ट्रासाउंड की समस्या मरीजों के लिए गंभीर है। दिन में अल्ट्रासाउंड की पर्ची पर नंबर लगता है। दिन में लंबी लाइन लगती है। ऐसे में शुरूआती 20 महिलाओं का ही अल्ट्रासाउंड हो पाता है। इसलिए 20 नंबर तक अपना नंबर लगवाने के लिए मरीज व उनके सहयोगी एक दिन पहले ही अस्पताल में डेरा डालने को बाध्य हैं। एक सदस्य ने बताया कि वे तीन दिन से अस्पताल आ रहे हैं, लेकिन नंबर नहीं लगा। किसी ने बताया कि रात को ही आने पर नंबर लग जाता है तो चले आए। वहीं, सिक्योरिटी गार्ड ने बताया कि यह कई दिन से चल रहा है। मना करने पर भी लोग यहीं पर ईंट लगा लेते हैं और सो जाते हैं। 

ईंट रखकर लगाते हैं अपना नंबर 
जिन मरीजों को अल्ट्रासाउंड की पर्ची पर नंबर लगवाना होता है वह शाम के समय अस्पताल में पहुंच जाते हैं। अपनी-अपनी पर्ची को नंबर के हिसाब सेेेेेेेे ईंटों के नीचे दबा देते हैं। कोई उनका नंबर काट न सकें, इसलिए वह रात को पंजीकरण खिड़की के बाहर ही सो जाते हैं।सुबह नंबर के हिसाब से लाइनोें में खड़े हो जाते हैं, तब कहीं जाकर उनका अल्ट्रासाउंड हो पाता है। 

इलाज का चक्कर लंबा 
गर्भवती महिलाओं को अल्ट्रासाउंड करवाने के लिए जटिल प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ता है। पहले उन्हें डॉक्टर से मिलने के लिए पर्ची लेनी होती है। इसके बाद डॉक्टर को चैकअप के लिए लाइन में लगना पड़ता है। यदि डॉक्टर अल्ट्रसाउंड लिख देता है तो उन्हें अल्ट्रासाउंड की पर्ची पर नंबर लगवाना पड़ता है। इसके लिए उन्हें अस्पताल में एक दिन पहले से लाइन में लगना पड़ेगा। तब जाकर उनका ईलाज संभव हो पाता है। 

900 रुपये बचाने के लिए मुसीबत 
सरकारी अस्पताल में फ्री में अल्ट्रासाउंड होते हैं, जबकि निजी अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर 900 रुपये प्रति अल्ट्रासाउंड का रेट है। मरीज 900 रुपये बचाने के चक्कर में रातभर परेशानी का सामना करते हैं। मरीजों की मांग है कि यदि अल्ट्रासाउंड का रेट 400 रुपये हो जाए तो उन्हें रातभर परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा। मेडिकल कालेज के सामने ही कई अल्ट्रासाउंड केंद्र हैं, वहां पर टेस्ट के नाम पर 600 रुपये से 1500 रुपये तक लिये जाते हैं। जबकि सरकारी अस्पताल में गर्भवति महिलाओं के अल्ट्रासाउंड निशुल्क है। इसलिए यहां पर भीड़ रहती है। 


एक रेडियोलॉजिस्ट है। रोजाना 40 अल्ट्रासाउंड हो रहे हैं। इनमें गर्भवती महिलाओं के 20 अल्ट्रासाउंड होते हैं। जो मरीज अल्ट्रासाउंड से रह जाते हैं उनका अगले दिन पहले नंबर लगता है। दो और रेडियोलॉजिस्ट की मांग की हुई है। सुबह 8 बजे पर्ची के लिए खिड़कियां खुलती हैं। मरीजों को चाहिए कि वह टाइम पर आएं। कई बार सिक्योरिटी गार्ड को बोल चुके हैं, मना करने भी लोग नहीं मानते। 
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-डॉ. योगेश शर्मा, उपचिकित्सा अधीक्षक, मेडिकल कालेज।
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