इसी टीले पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की ओर से पहले भी रिसर्च किया जा चुका है। करीब 50 साल पहले यहां दो पिलरों पर बनी यक्ष-यक्षणी कि पत्थर की मूर्तियां भी मिली थीं, जो कि आस पास के क्षेत्रों में आज भी चर्चा का विषय है। वर्तमान में भी ये मूर्तियां दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रदर्शित हैं।
इस टीले की ऊंचाई 18 से 20 फुट के करीब है, जिस पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के शोधार्थियों की ओर से लगातार शोध किए जा रहे हैं। विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के शोधार्थी जसबीर सिंह, विनोद कुमार और गुलशन टीले पर करीब डेढ़ माह से पुरातात्विक शोध कार्य कर रहे हैं। इसी दौरान ये शंख मिला है।
राखीगढ़ी में भी शोध कर चुके शोधार्थी जसबीर सिंह का कहना है कि टीले पर यह शंख कुषाणकालीन लेयर पर ही मिला है, जिसके साथ उस समय के कई अन्य अवशेष भी मिले हैं। इस संबंध में पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को भी जानकारी दी गई है। जल्द एक पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की टीम यहां जांच के लिए पहुंचेगी।
टेराकोटा से बना है शंख : भट्टाचार्या
पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की उपनिदेशक डॉ बिनानी भट्टाचार्या का कहना है कि यह शंख ही है और टेराकोटा (पक्की मिट्टी) से बना है। हालांकि यह अभी जांच का विषय है कि यह किस समयकाल के दौरान का है, लेकिन यह पाषाणकालीन हो सकता है। पहले भी उस समय के ऐसे शंख अन्य जगहों पर मिल चुके हैं और ये सजावट के लिए भी घरों में रखे जाते रहे हैं। जांच के बाद ही सही जानकारी हो सकती है।
कुवि के प्राचीन इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ राजपाल का कहना है कि यह शंख पाषाणकालीन हो सकता है। यहां पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की ओर से खुदाई की जाए तो महाभारतकालीन अन्य वस्तुएं मिलना भी संभव हैं। पहले भी यहां यक्ष-यक्षणी की मूर्तियां मिल चुकी हैं। यह बेहद ऐतिहासिक टीला है।