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अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव : रावण की भूमिका में दिखे अभिनेता आशुतोष राणा

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कुरुक्षेत्र। ब्रह्मसरोवर के पुरुषोत्तमपुरा बाग के मुख्य मंच पर शनिवार को हमारे राम नाटक का शानदार मंचन हुआ। इस मंचन में अभिनेता आशुतोष राणा रावण की भूमिका में नजर आए। तीन घंटे तक चले नाटक ने दर्शकों को भारतीय पौराणिक कथाओं के एक जटिल चरित्र रावण को नए दृष्टिकोण से समझने का अवसर दिया।
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रावण के किरदार में राणा की गहरी समझ और उनके भावपूर्ण प्रदर्शन ने दर्शकों को सम्मोहित कर दिया। हरियाणा कला एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग की तरफ से हमारे राम थीम को लेकर नाटक का मंचन का शुभारंभ राज्यमंत्री रहे सुभाष सुधा, चेयरमैन धर्मवीर डागर, चेयरमैन धर्मवीर मिर्जापुर, भाजपा जिलाध्यक्ष सुशील राणा समेत अन्य ने दीप प्रज्वलित कर किया।
प्रसिद्ध अभिनेता आशुतोष राणा ने नाटक में रावण का किरदार बेहद प्रभावशाली ढंग से निभाया है। उनकी संवाद अदायगी, उनकी भाव-भंगिमाएं और मंच पर उनकी उपस्थिति इतनी प्रबल थी कि दर्शक उनके साथ रावण के द्वंद्व, संघर्ष और अंतर्द्वद्व को महसूस कर रहे थे। इस नाटक में आशुतोष राणा ने रावण के चरित्र की गहराइयों को कुशलता से उभारा, जिसमें एक ओर वह अत्यंत ज्ञानी, विद्वान और तपस्वी के रूप में दिखे तो दूसरी ओर एक अहंकारी, क्रोधी और असत्य के प्रतीक के तौर पर भी।
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उनका निभाया किरदार ऐसा था कि एक तरफ तो वह श्रीराम को ललकार रहा है, लेकिन दूसरी ओर अंदर ही अंदर इसी के जरिए वह अपने ज्ञान और पांडित्य के अहंकार से भी मुक्त होना चाह रहा है। रावण को हमेशा एक नकारात्मक चरित्र के रूप में देखा गया है, लेकिन उसके व्यक्तित्व में कई परतें हैं, वह सिर्फ एक खलनायक नहीं था, बल्कि वह एक महान विद्वान, शिव भक्त और तपस्वी था।
उसकी नकारात्मकता उसके अहंकार और वासनाओं से आई, लेकिन उसके भीतर भी ज्ञान और सच्चाई की तलाश थी। उन्होंने नाटक के माध्यम से रावण की गहराई और उसके प्रति अपने दृष्टिकोण पर खुलकर प्रकाश डाला। उसे नकारात्मक रूप में देखना उसकी महानता को कम आंकने जैसा है। रावण न केवल एक शक्तिशाली राजा था, बल्कि वह एक ज्ञानी और विद्वान भी था। उसकी इच्छा आत्मज्ञान और मोक्ष से भी परे थी। रावण का अंत उसके अहंकार का अंत था।
यह उसकी आध्यात्मिक यात्रा का समापन था। इस दृष्टिकोण से, रावण एक आदर्श विरोधाभास है, जहां वह बुराई का प्रतीक होने के बावजूद अंतत: ज्ञान और मुक्ति की ओर अग्रसर होता है। उधर, राणा ने कहा कि हर व्यक्ति के भीतर राम और रावण हैं। यह हमारे ऊपर है कि हम किसे प्राथमिकता देते हैं। जब हम अपने भीतर की इच्छाओं और वासनाओं को नियंत्रित करते हैं, तभी हम सच्चे राम के अनुयायी बनते है।
नाटक में आज के समय में अच्छाई और बुराई के बीच के संघर्ष को दर्शाया गया। वर्तमान युग में भी हर व्यक्ति इस द्वंद्व से गुजर रहा है। वह अच्छाई और बुराई के बीच उलझ रहा है। हमारे जीवन में भी राम और रावण का संघर्ष है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपने भीतर के राम को जगह दें या रावण को। जब हम राम के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाएंगे, तभी हम सच्चे अर्थों में सफल होंगे।
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