कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में सरस्वती नदी-भारतीय ज्ञान प्रणाली और संस्कृति की जननी विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस के दूसरे दिन तकनीकी सत्रों का आयोजन हुआ। वैज्ञानिक, साहित्यिक, पुरातात्विक और उपग्रह आधारित शोधों ने सरस्वती नदी की व्यापकता और वैश्विक प्रभाव को रेखांकित किया। तकनीकी सत्र की अध्यक्षता कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. वीरेंद्र पाल ने की।
उन्होंने कहा कि सरस्वती नदी केवल एक नदी नहीं बल्कि प्राचीन भारतीय सभ्यता, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का केंद्र रही है। 2.5 करोड़ वर्ष पुरानी मानी जाने वाली नदी है, जो भारत की ऐतिहासिक निरंतरता और सांस्कृतिक परंपराओं को रेखांकित करती है। हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम अपनी प्राचीन विरासत और संस्कृति का संरक्षण करें और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाएं।
तकनीकी सत्र के प्रथम सत्र में दर्शन लाल जैन सेंटर के निदेशक व छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रो. एआर चौधरी ने कहा कि सरस्वती नदी अखंड भारत की सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न अंग रही है। सरस्वती पर केंद्रित शोध यह सिद्ध करता है कि भारतीय सभ्यता की जड़ें अत्यंत गहरी और वैज्ञानिक दृष्टि से समृद्ध हैं। हरियाणा सरस्वती हेरिटेज डेवलपमेंट बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कुमार सुप्रविन ने कहा कि सरस्वती नदी के पुनर्जीवन और इसके अविरल प्रवाह के लिए बोर्ड की ओर से निरंतर और ठोस प्रयास किए जा रहे हैं। धरातल पर किए गए कार्यों के सकारात्मक परिणाम अब दिखाई देने लगे हैं। स्ट्रक्चरल डिजाइन कंसलटेंट देबप्रिय बिस्वल ने कहा कि भारतीय परंपरा में गांव से लेकर राष्ट्र तक की सीमाएं जल-निर्गम के आधार पर तय की जाती थीं। भारतीय संस्कृति में जल को धर्म से जोड़ा गया है। उन्होंने नदियों के संरक्षण के लिए आधुनिक हाइड्रोलॉजिकल मॉडल अपनाने की आवश्यकता बताई। कॉन्फ्रेंस में डॉ. एस कल्याण रमन, रविकांत, प्रो. मनमोहन शर्मा, डॉ. तेजस ने भी अपने विचार साझा किए।
आदिबद्री से लेकर राजस्थान और गुजरात तक की थी यात्रा
इसरो के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. पीएस ठक्कर (गुजरात) ने पीपीटी माध्यम से बताया कि साहित्यिक, वैदिक और आधुनिक शोधों के अनुसार वैदिक सरस्वती नदी माउंट मैरु क्षेत्र से निकलकर राजस्थान होते हुए गुजरात के कच्छ क्षेत्र तक बहती थी। सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग से प्राप्त एरियल चित्रों के माध्यम से रण ऑफ कच्छ, धौलावीरा, लोथल, द्वारका, मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे प्रमुख पुरातात्विक स्थलों की ऐतिहासिकता को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि मेरोपंत पिंगले और डॉ. वीएस वाकांकर ने दर्शन लाल जैन के नेतृत्व में सरस्वती नदी के उद्गम स्थलों की खोज के लिए आदिबद्री से लेकर राजस्थान और गुजरात तक व्यापक यात्रा की थी।
रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में भी सरस्वती नदी का उल्लेख
ओएनजीसी के पूर्व चीफ जनरल मैनेजर डॉ. एनपी सिंह ने कहा कि सरस्वती नदी हिमालय से निकलकर लगभग 1500 किलोमीटर की यात्रा करते हुए हरियाणा, पंजाब, राजस्थान से गुजरकर गुजरात के रण ऑफ कच्छ तक जाती थी। रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में भी सरस्वती नदी का उल्लेख मिलता है। वर्ष 2006 में जैसलमेर में खोदे गए बोरवेल से जल की उपलब्धता सिद्ध हुई जिसका उपयोग आज भी स्थानीय लोग कर रहे हैं। उन्होंने सरस्वती से जुड़े 10 प्राचीन कुओं की जानकारी भी साझा की।
अंतरराष्ट्रीय वक्ताओं ने साझा किए विचार
अंतरराष्ट्रीय विद्वान अलेह पेरजाशकेविच ऑनलाइन जुड़े। उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास और संस्कृति का प्रभाव विश्व के कई हिस्सों में देखने को मिलता है। दक्षिण तुर्कमेनिस्तान में मिली मुहरों, मोतियों और चित्रों का सीधा संबंध हड़प्पा और प्री-हड़प्पा कालीन भारतीय सभ्यता से है। वहीं अमेरिका से आए जिजिथ रवि ने सरस्वती से गंगा का प्रवास विषय पर प्रस्तुति दी और कहा कि पारिस्थितिक बदलाव के कारण भारतीय सभ्यता का विस्तार सरस्वती क्षेत्र से गंगा की ओर हुआ।
कुरुक्षेत्र। प्रतिभागियों को संबोधित करते डॉ. एनपी सिंह। संवाद
कुरुक्षेत्र। प्रतिभागियों को संबोधित करते डॉ. एनपी सिंह। संवाद
कुरुक्षेत्र। प्रतिभागियों को संबोधित करते डॉ. एनपी सिंह। संवाद