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खेत के अवशेष खेत में ही रहने दें तो नहीं पड़ेगी खाद की जरूरत : कृषि मंत्री राणा

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कुरुक्षेत्र। गुरुकुल कुरुक्षेत्र में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के सहयोग में किसान चौपाल चर्चा का आयोजन किया गया, जिसमें प्राकृतिक खेती के विशेषज्ञों ने प्रदेशभर से जुटे किसानों से सीधा संवाद किया। वर्तमान में प्राकृतिक खेती की आवश्यकता और किसानों के मन में प्राकृतिक खेती को लेकर उठने वाले सवालों को लेकर जवाब दिए गए। गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत और हरियाणा के कृषि मंत्री श्याम सिंह राणा ने किसानों को प्राकृतिक खेती करने के लिए प्रेरित किया।
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इससे पहले मंत्री ने गुरुकुल के प्राकृतिक फार्म का भ्रमण किया, जहां 15 फीट से ऊंचे गन्ने को देखकर वे हैरत में पड़ गए। फार्म पर मंत्री श्याम सिंह राणा ने अमरूद, सेब, आम, लीची के बाग और हरी सब्जियों की फसलों पर विस्तार से चर्चा की। गुरुकुल के क्रेशर पर मंत्री और आचार्य ने गरम गुड़ का स्वाद चखा। फार्म के बाद सभी अतिथियों ने गुरुकुल की गोशाला, विद्यालय भवन तथा एनडीए ब्लॉक का भ्रमण किया।

कृषि मंत्री श्याम सिंह राणा ने कहा कि आज खेतों में उत्पादन बढ़ाने के लिए जो पेस्टीसाइड, यूरिया, डीएपी व कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग हो रहा है। इसके दुष्परिणाम कैंसर, हार्टअटैक, बीपी, शुगर जैसी बीमारियों के रूप में हमारे सामने हैं। खेतों में कीटनाशक और यूरिया डालकर किसानों ने भूमि को बंजर बना दिया है, वहीं पीने का पानी भी दूषित हो गया है, इससे बचने का एक ही उपाय है कि किसान प्रकृति के अनुरूप ही खेती करें अर्थात् प्राकृतिक खेती को अपनाएं। उन्होंने किसानों से आह्वान किया कि फसलों के अवशेष खेतों में ही डालें, उनमें आग न लगाएं, ये अवशेष खेतों में खाद का काम करेंगे।
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गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने कहा कि किसानों को प्राकृतिक खेती और जैविक खेती के बीच अंतर को समझना बेहद जरूरी है, कई किसान प्राकृतिक खेती को भी जैविक खेती मानकर इसे अपनाने में संकोच करते हैं। जबकि यह जैविक खेती से बिल्कुल अलग और किसानों के लिए लाभप्रद है। देश में पिछले 40 वर्षों से जैविक खेती का प्रचार किया जा रहा है मगर आज तक कोई भी जैविक खेती का प्रभावी मॉडल नहीं बन पाया, इसके पीछे कई कारण हैं। जिस केंचुए द्वारा जैविक खाद बनाई जाती है वह केवल गोबर खाता है, हैवी मेटल छोड़ता है। इसके अलावा जैविक खेती में खर्चा बहुत अधिक है और उत्पादन कम, जिस कारण यह खेती लोकप्रिय नहीं हुई। इसके विपरीत प्राकृतिक खेती में लागत बहुत कम है और उत्पादन पूरा, साथ ही किसान को प्राकृतिक उत्पाद का मूल्य भी डेढ़-दोगुणा मिलता है।
प्राकृतिक खेती में किसान केवल एक देसी गाय के गोबर और गोमूत्र से 30 एकड़ भूमि पर खेती कर सकता है। किसान को बाजार से कोई खाद, कीटनाशक आदि खरीदने जरूरत ही नहीं पड़ती। इस मौके पर गुरुकुल के प्रधान राजकुमार गर्ग, उप प्रधान मास्टर सतपाल कांबोज, अटारी जोधपुर निदेशक डॉ. जेपी मिशरा, चौ. चरण सिंह हरियाणा कृषि विवि के कुलसचिव एवं विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. बलवान सिंह, निदेशक बिग्रेडियर डॉ. प्रवीण कुमार, प्राचार्य डॉ. सूबे प्रताप, रामनिवास आर्य सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे।

मैं हवा में नहीं, धरातल पर करता हूं कार्य : राज्यपाल
गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने अटारी जोधपुर निदेशक एवं विस्तार शिक्षा निदेशक से नाराजगी जताते हुए कहा कि प्राकृतिक खेती पर कार्य करना है, अभी तक धरातल पर प्रदेश में कोई कार्य नहीं किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि किसानों को प्रशिक्षण देने वाला ही नहीं है कोई, किसानों की पूरी की पूरी फसल मर रही है। मैं हवा में नहीं, धरातल पर कार्य करता हूं। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती पर कार्य करना जल्द शुरू कर दें, अभी तक लोगों को जैविक और प्राकृतिक खेती के बीच अंतर तक नहीं पता है।

देसी गाय पालने वाले किसान को 30 हजार रुपये सहयोग राशि देने की घोषणा की
कृषि मंत्री श्याम सिंह राणा ने भी प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की बात कही तथा प्राकृतिक खेती हेतु देसी गाय पालने वाले किसान को 30 हजार रुपये सहयोग राशि देने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि प्रकृति से छेड़छाड़ के परिणाम हमेशा खतरनाक होते हैं। इससे पहले 25 हजार रुपये सहयोग राशि दी जाती थी, लेकिन प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए इस राशि को 30 हजार करने की घोषणा की।
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