आजादी के 75 सालों में भारतीय भाषा एवं संस्कृति ने विदेशों में अपनी अलग पहचान बनाई है। पिछले 30 सालों में भारतीय भाषा एवं संस्कृति भारत की सीमाओं को पार कर पूरे विश्व में प्रचारित एवं प्रसारित हुई है। यह विचार बुल्गारिया विश्वविद्यालय में इंडोलॉजी विभाग की डॉ. मोना ने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के आईआईएचएस संस्थान द्वारा ‘आजादी के बाद विदेशों में भारतीय भाषा एवं संस्कृति का प्रचार’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में अभिव्यक्त करते हुए कहे।
डॉ. मोना ने कहा कि सोफिया यूनिवर्सिटी में हिंदी भाषा पढ़ने वाले छात्र आज विश्व के अनेक देशों में हिंदी का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। इस अवसर पर डॉ. मोना ने संस्कृत बुल्गारियन कोष का परिचय भी छात्रों से करवाया। संगोष्ठी का आयोजन विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में किया गया।
इससे पूर्व आईआईएचएस संस्थान के प्राचार्य संजीव गुप्ता ने कहा कि हिंदी के साथ-साथ दूसरी भाषाओं का ज्ञान भी जरूरी है। इस मौके पर आईआईएचएस संस्थान के विभागाध्यक्ष डॉ. महासिंह पूनिया ने कहा कि हिंदी को पूरे विश्व में 90 करोड़ से ज्यादा लोग बोलते व पढ़ते हैं। आज हिंदी विश्व के बाजार की मांग का हिस्सा बन चुकी है तथा इसमें रोजगार की अपार संभावनाएं हैं।
इस मौके पर कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. सुभाष ने कहा कि हिंदी भाषा समाज की समृद्धि का प्रतीक है। अंग्रेजी भाषा का विकास 14वीं सदी से शुरू होता है और वह पूरे विश्व की भाषा बन जाती है, जबकि हिंदी एवं संस्कृत भाषा का इतिहास हजारों साल पुराना है। आज आवश्यकता है हिंदी के साथ-साथ भारत की सभी भाषाओं को संरक्षित करने की। मंच संचालन डॉ. वंदना ने व डॉ. सुकरमवती ने किया। इस मौके पर महिला शोध संस्थान की निदेशिका डॉ. अनिता दुआ भी उपस्थित रहीं।
डॉ. मोना ने कहा कि बुल्गारिया के इंडोलॉजी विभाग ने हनुमान चालीसा का अनुवाद 40 भाषाओं में कर उसकी हजारों प्रतियां 23 से अधिक देशों में प्रचारित एवं प्रसारित की हैं। आज बुल्गारिया में 500 से अधिक लोगों को हनुमान चालीसा कंठस्थ है।