कुरुक्षेत्र। कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए रासायनिक खाद, केमिकल और पेस्टीसाइड का अंधाधुंध इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे बच्चों में दिल व किडनी से जुड़ी बीमारियां होने लगी है। यह केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश आदि प्रदेशों में कराए गए एक सर्वे में सामने आया है। ऐसे में हमें इस खेती को छोड़ प्राकृतिक खेती को अपनाना होगा। यह कहना है गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत का।
वे गुरुकुल कुरुक्षेत्र में प्राकृतिक खेती मॉडल को देखने नेपाल से पहुंचे अधिकारियों, कृषि वैज्ञानिकों व किसानों के दल को संबोधित कर रहे थे। यह दल गुरुकुल में तीन दिन के लिए पहुंचा है, जो हर तकनीक को समझेगा। इसके साथ ही गुरुकुल फार्म का अवलोकन कर फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन को तथ्यों के साथ जान पाएगा। मंगलवार को प्राकृतिक कृषि गोष्ठी का भी आयोजन किया गया, जिसमें आचार्य ने प्राकृतिक कृषि के सिद्धांत और इसकी आवश्यकता पर विस्तृत चर्चा की। इस अवसर पर वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डाॅ. हरिओम द्वारा लिखित ‘प्राकृतिक खेती के मूलभूत सिद्धांत’ नामक पुस्तक का भी राज्यपाल द्वारा विमोचन किया गया। गोष्ठी में व्यवस्थापक रामनिवास आर्य विशेष रूप से उपस्थित रहे।
राज्यपाल ने बताया कि स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा कराए सर्वे में पता चला कि कई जगहों पर रासायनिक खेती के चलते लोगों में चर्म रोग बढ़ता जा रहा है। पंजाब से तो कैंसर के मरीजों के लिए एक कैंसर ट्रेन भी चलाई जा रही है। ऐसे में खेती में पेस्टीसाइड और केमिकल का इस्तेमाल बंद होना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसा ही हाल जैविक (ऑर्गेनिक) खेती में है, इसमें प्रयोग होने वाले खाद और दवाइयां इतनी महंगी है कि किसान की लागत बहुत अधिक बढ़ जाती है और उत्पादन घट रहा है। राज्यपाल ने बताया कि उन्होंने स्वयं लगभग पांच वर्षों तक ऑर्गेनिक खेती की है मगर इसमें उत्पादन लगातार घटता रहा, इसलिए बाद में उन्होंने प्राकृतिक खेती को अपनाया। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती ही किसान और पर्यावरण को बचा सकती है और यह पूरी तरह से किसानों के हित में है। उनके नेतृत्व में अब तक हिमाचल, गुजरात, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, गोवा आदि स्थानों से लाखों किसानों ने प्राकृतिक खेती को अपनाया है और आने वाले दो वर्षों में गुजरात को जहरमुक्त प्रदेश बनाना उनका लक्ष्य है।
नेपाल से आए अधिकारी व किसान डाॅ. हरिओम के नेतृत्व में गुरुकुल के फार्म पर पहुंचे जहां उन्होंने गन्ना, धान, ड्रेगन फ्रूट सहित विभिन्न सब्जियों की फसलों को देखा। डाॅ. हरिओम ने बताया कि यहां पर धान में पानी हमेशा भरकर नहीं रखा जाता बल्कि दूसरी फसलों की तरह ही सिंचाई की जाती है और उत्पादन रासायनिक खेती से अधिक होता है। इसी प्रकार गन्ना एक बार लगाने के बाद लगातार पांच वर्षों तक फसल होती है जिसका उत्पादन 400 से 600 क्विंटल प्रति एकड़ तक हुआ है। फार्म पर सेब और केले की लघु वाटिका देखकर भी वे गदगद हो उठे।