कुरुक्षेत्र। कच्ची घोड़ी नृत्य की प्रस्तुति देते राजस्थान के कलाकार। आयोजक
कुरुक्षेत्र। पावन ब्रह्मसरोवर तट पर चल रहे अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव में देश की लोक संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। महोत्सव के 11वें दिन पूरा माहौल लोकगीतों की मधुर धुनों, पारंपरिक वाद्यों और रंगीन लोक वेशभूषा से सराबोर दिखा। ब्रह्मसरोवर के घाट सुबह से शाम तक अलग-अलग राज्यों की कला-धारा से गुंजायमान रहे। पर्यटक इस अनूठी सांस्कृतिक झांकी को देखकर मंत्रमुग्ध हो उठे। हरियाणा पैवेलियन में भी कलाकार दर्शकों को संस्कृति से रूबरू करवा रहे हैं।
उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक कला केंद्र की ओर से आमंत्रित विभिन्न राज्यों के कलाकारों ने अपनी-अपनी परंपरागत कला का शानदार प्रदर्शन किया। हिमाचल प्रदेश के पूजा और घट नृत्य की लय, जम्मू-कश्मीर के धमाली और रुमाल नृत्य की उमंग, पंजाब के झूमर और मलवई गिद्दा की थाप, राजस्थान के चारी और कच्ची घोड़ी की अदाएं-हर प्रस्तुति ने दर्शकों के दिल जीत लिए। वहीं उत्तराखंड का पांडव नृत्य, मध्य प्रदेश का पांथी और गंगौर, झारखंड का पायका, उड़ीसा का संभालपूरी नृत्य, मणिपुर का लाई हरोबा व मणिपुरी रास और गुजरात का सिद्दी धमाल, हर राज्य की अपनी झलक महोत्सव को बहुरंगी बना रही है। कलाकार न सिर्फ नृत्य दिखा रहे हैं बल्कि अपने गीत, पारंपरिक पोशाकों और अनुष्ठानों के माध्यम से अपनी समृद्ध संस्कृति को पर्यटकों तक पहुंचा रहे हैं।
शिल्प एवं सरस मेले में मिट्टी, बांस, लकड़ी, धातु और कपड़े से बने हस्तशिल्पों की खरीदारी के लिए सुबह से ही लोग उमड़े। वहीं स्वयं सहायता समूहों के उत्पादों को भी खूब सराहना मिली। पारंपरिक हस्तकला की विविधता ने मेले को विशेष पहचान दी।