कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में आयोजित 10वें अंतरराष्ट्रीय गीता सम्मेलन-2025 के तहत विभिन्न विभागों में स्वधर्म, कर्तव्य, शांति, सद्भाव, शिक्षा, प्रबंधन और कला जैसे बहुआयामी विषयों पर तकनीकी एवं प्लेनरी सत्र आयोजित किए गए। देश-विदेश के विद्वानों, शिक्षकों, शोधार्थियों और छात्रों ने गीता के शाश्वत संदेश को आधुनिक जीवन, शिक्षा, प्रशासन, कला और वैश्विक शांति से जोड़ते हुए अपने विचार प्रस्तुत किए।
13 तकनीकी सत्रों में विशेषज्ञों ने गीता को मानवीय सद्भाव का शाश्वत मार्गदर्शक बताया और इसे जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया। सम्मेलन में 800 के करीब शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। 24 नवंबर को आयोजित सम्मेलन का समापन बुधवार को हुआ। समापन सत्र से पहले तीन दिन तक प्लेनरी और तकनीकी सत्र का आयोजन किया गया।
क्षमता और रुचि के अनुरूप अपनाना चाहिए कार्य : प्रो. विजय अरोड़ा
सीनेट हाल में डॉ. भीमराव आंबेडकर अध्ययन केंद्र की ओर से स्वधर्मः धर्मनिष्ठ आचरण का आंतरिक पथ प्रदर्शक विषय पर तकनीकी सत्र आयोजित किया गया। चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय सिरसा के कुलपति प्रो. विजय अरोड़ा ने मुख्य अतिथि के रूप में अपने विचार साझा किए और कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता और रुचि के अनुरूप कार्य करना चाहिए। यही स्वधर्म है और राष्ट्रहित में इसका पालन बेहद आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि स्वधर्म हमें नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर ले जाता है और जीवन में परम आनंद प्रदान करता है। विद्यार्थी यदि स्वयं से संवाद करें और अपनी रुचियों को पहचानें, तो वे जीवन में सही दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। मुख्य वक्ता और गुरुग्राम विश्वविद्यालय के फाउंडर पूर्व कुलपति डॉ. मार्कंडेय आहूजा ने कहा कि स्वधर्म को अपनाने से व्यक्ति का कल्याण सुनिश्चित होता है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य छात्रों के भीतर दिव्यता को जागृत करना है और वही दिव्यता स्वधर्म का आधार है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. वीरेंद्र पाल ने कहा कि स्वधर्म पालन से ही सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है। समाजसेवी डॉ. प्रदीप सैनी ने गीता को जीवन का सही मार्गदर्शक बताया। वहीं डॉ. अवनीत वडैच ने कहा कि मन की शक्ति को पहचानकर ही व्यक्ति अपना वास्तविक स्वधर्म समझ सकता है। कार्यक्रम में केंद्र निदेशक डॉ. प्रीतम सिंह सहित अनेक गणमान्य उपस्थित रहे।
भगवद्गीता के आलोक में कला विषय पर रखे विचार
फाइन आर्ट्स विभाग की ओर से गीता सम्मेलन के अंतर्गत भगवद्गीता के आलोक में कलाः आंतरिक शांति और सार्वभौमिक सद्भाव की ओर एक मार्ग विषय पर तकनीकी सत्र आयोजित किया गया। विशिष्ट वक्ता प्रो. कविता सिंह (पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला) ने कहा कि कला मनुष्य की वह शक्ति है, जो भाषा, समय और संस्कृति की सीमाओं से परे जाकर गीता के मूल संदेश कर्तव्य, समरसता और शांति को सजीव रूप में अभिव्यक्त करती है।
वक्ता डॉ. सौरव चौधरी ने बताया कि रचनात्मक साधना न केवल व्यक्तिगत विकास और मानसिक संतुलन को मजबूत करती है बल्कि समाज में सामूहिक शांति और आध्यात्मिक जागरण का आधार भी बनती है। फाइन आर्ट्स विभाग के अध्यक्ष डॉ. गुरचरण सिंह ने कहा कि गीता सदियों से कलाकारों और साधकों के लिए प्रेरणा का प्रखर स्रोत रही है। इस मौके पर डॉ. पवन कुमार, प्रो. भगवान सिंह चौधरी, प्रो. परमेश कुमार, कुटा प्रधान डॉ. जितेंद्र खटकड़ सहित शिक्षक और शोधार्थी मौजूद रहे।
गीता ज्ञान आधुनिक प्रबंधन और नेतृत्व के लिए आज भी दिशा-प्रदर्शक
यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मैनेजमेंट और इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज की ओर से गीता सम्मेलन के अंतर्गत प्रबंधन में उत्कृष्टता के लिए भगवद्गीता का अपरिवर्तनीय रूपांतरणात्मक ज्ञान विषय पर तकनीकी सत्र आयोजित किया गया।
सत्र में प्रो. कृष्ण कुमार पांडेय ने गीता आधारित नैतिक नेतृत्व की व्याख्या की। वहीं प्रो. राधाकृष्णन पिल्लै ने डिजिटल माध्यम से चाणक्य और श्रीकृष्ण के रणनीतिक चिंतन को एक साथ जोड़ते हुए विचार प्रस्तुत किए। प्रो. ऋषि राज शर्मा ने मूल्य-आधारित प्रबंधकीय निर्णयों पर बल दिया और प्रो. कुसुम लता ने गीता के दार्शनिक पक्षों को व्यावहारिक उत्कृष्टता से सुंदरता से जोड़ा। वक्ताओं ने यह स्पष्ट किया कि गीता का सनातन ज्ञान आधुनिक प्रबंधन और नेतृत्व के लिए आज भी दिशा-प्रदर्शक है।
उद्घाटन के बाद दो समानांतर तकनीकी सत्र हुए जिनमें 160 से अधिक पंजीकरणों ने विद्वानों की उत्साहपूर्ण सहभागिता को दर्शाया। पहले सत्र में तनाव प्रबंधन, नैतिक नेतृत्व, डिजिटल चुनौतियां, एआई गवर्नेंस, सतत बैंकिंग, डिजिटल मार्केटिंग में पारदर्शिता और मानव विकास जैसे विषयों पर शोध प्रस्तुत किए गए। दूसरे सत्र में कॉर्पोरेट गवर्नेंस, सीएसआर नैतिकता, एमएसएमई विकास, गुण-आधारित नेतृत्व, नैतिक तकनीक और उपभोक्ता व्यवहार पर गहन विमर्श हुआ। इस मौके पर सत्र निदेशक प्रो. रमेश चंदर, प्रो. अनिल कुमार मित्तल, दिल्ली विश्वविद्यालय, ओपी जिंदल विश्वविद्यालय, पंजाबी विश्वविद्यालय, एमडीयू रोहतक सहित कई संस्थानों के शोधार्थी और विद्यार्थी मौजूद रहे।
गीता शांति, सहयोग और सामंजस्य का मूल : प्रो. जावियर
विवि के इंस्टिट्यूट ऑफ टीचर ट्रेनिंग एंड रिसर्च (आईटीटीआर) में अंतरराष्ट्रीय गीता सम्मेलन के तहत प्लेनरी सत्र आयोजित किया गया जिसमें देश और विदेशों से आए विद्वानों ने गीता के वैश्विक दृष्टिकोण पर विचार प्रस्तुत किए। चीन के प्रो. ली जियानलिन ने कहा कि गीता का अभ्यास भय और निराशा को दूर कर नेतृत्व क्षमता विकसित करता है।
स्पेन के प्रो. जावियर रूइज काल्डेरॉन ने गीता को शांति को सहयोग और सामंजस्य का मूल बताया। भारत के प्रो. दिनेश चहल ने स्वधर्म, निष्काम कर्म, स्थितप्रज्ञता और लोकसंग्रह को समाज निर्माण का आधार बताया। सीडीएलयू सिरसा के प्रो. विजय कुमार ने कहा कि आंतरिक शांति ही सामाजिक सद्भाव की नींव है। श्रीलंका के प्रो. असंगा तिलकरत्ने ने गीता और बौद्ध चिंतन के दार्शनिक समन्वय पर चर्चा की। अमेरिका से आईं मैडम सत्य कालरा ने कहा कि मन की शांति ही वैश्विक शांति का वास्तविक आधार है।
वहीं आईटीटीआर में स्वधर्म और चरित्र, सद्भाव और नागरिकता के लिए शिक्षा विषय पर गीता सम्मेलन के अंतर्गत तकनीकी सत्र का आयोजन किया गया। सत्र की संयोजक एवं प्राचार्य प्रो. अनीता दुआ ने कहा कि भगवद्गीता नैतिक स्पष्टता, आत्म-जवाबदेही और चरित्र निर्माण के लिए शाश्वत मार्गदर्शन प्रदान करती है।
मुख्य वक्ता डॉ. सीडीएस कौशल और प्रो. आरके देसवाल ने बताया कि स्वधर्म से व्यक्ति में आत्म-अनुशासन, नैतिक जागरूकता, धैर्य और विवेकपूर्ण निर्णय क्षमता का विकास होता है, जो उसे संतुलित और जिम्मेदार नागरिक बनाता है। विभिन्न संस्थानों से आए शोधार्थियों ने 20 शोध-पत्र प्रस्तुत किए जिनमें चरित्र निर्माण, नैतिक नेतृत्व, नागरिकता, शिक्षक मार्गदर्शन, नई शिक्षा नीति-2020, पर्यावरणीय नैतिकता और समग्र शिक्षा जैसे विषयों पर विचार रखे गए।
कुरुक्षेत्र। गीता सम्मेलन में अपने विचार साझा करते विदेशी वक्ता। संवाद