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Kurukshetra News: पंजाब के झूमर नृत्य पर झूम रहे देशभर के लोग

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कुरुक्षेत्र। अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव में पंजाब का प्रख्यात एवं प्राचीन झूमर नृत्य अपनी खास छाप छोड़ रहा है, जिस पर देशभर से पहुंचे पर्यटक झूम रहे हैं। ढोल, तुंबा और बांसुरी की मधुर धुनों के साथ 13 कलाकारों के इस ग्रुप की प्रस्तुति देख पर्यटक थिरकने लगते हैं। 67 वर्षीय जसवंत सिंह इस ग्रुप का नेतृत्व कर रहे हैं। ये करीब 25 वर्षों से इस लोक नृत्य को जीवंत कर रहे हैं। इस ऊर्जावान नृत्य में कलाकार गोल घेरे में लचक और लय के साथ अपनी प्रस्तुति देते हैं। जसवंत सिंह के नेतृत्व में इस ग्रुप द्वारा किए जाने वाले नृत्य के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भी कायल रहे थे और उन्होंने जसवंत सिंह को इसके लिए वर्ष 2004 व 2006 में दो बार सम्मानित भी किया।
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जसवंत सिंह ड्राइंग के सेवानिवृत्त शिक्षक हैं। आज भले ही उनकी उम्र 67 वर्ष हो गई है लेकिन कला में इस तरह रमे हैं कि युवाओं को भी मात दे रहे हैं। गीता महोत्सव जैसे मंचों पर इनकी प्रस्तुतियां देशभर के लोगों को पंजाब की सांस्कृतिक समृद्धि से जोड़ रही हैं। महोत्सव में झूमर नृत्य न केवल मनोरंजन का साधन बना हुआ है बल्कि यह भारतीय संस्कृति के उस पहलू को भी सामने लाता है, जो आपसी मेल-जोल और उल्लास का प्रतीक है। दर्शक इसे देख भावविभोर हो रहे हैं और इस कला की प्रशंसा भी कर रहे हैं। वहीं, दूसरे प्रदेश के कलाकार भी इस नृत्य पर झूमते दिखाई दे रहे हैं।
जसवंत सिंह ने बताया कि इसे रावी की झूमर के नाम से जाना जाता है। पंजाब का एक पारंपरिक लोकनृत्य है, जो विभाजन से पहले पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र के संदल बार इलाके में अत्यधिक लोकप्रिय था। यह नृत्य सामूहिकता, संस्कृति, और उत्सवों का प्रतीक है।
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रावी की झूमर इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह रावी नदी के आसपास के क्षेत्रों में प्रचलित था। उन्होंने बताया कि उनके ग्रुप में 26 से 70 वर्ष के कलाकार हैं, जो ऊर्जावान झूमर नृत्य की प्रस्तुति पूरे जोश के साथ देते हैं।


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झूमर नृत्य की जड़ें हैं भारत-पाक विभाजन से पहले की : जसवंत
कलाकार जसवंत सिंह का कहना है कि झूमर नृत्य की जड़े भारत-पाकिस्तान विभाजन से पहले के समय की हैं। ये मनोरंजन और सामाजिक आयोजनों का हिस्सा है, जिसमें सामूहिक तौर पर खुशी व्यक्त की जाती है। इस नृत्य में कलाकार अपनी हरकतों और तालमेल से जीवन का उल्लास व्यक्त करते हैं। झूमर न केवल एक लोकनृत्य है, बल्कि यह पंजाब की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है।

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नई पीढ़ी तक पहुंचाने का कर रहे प्रयास
जसवंत सिंह और उनके साथी पिछले 30 वर्षों से झूमर नृत्य की इस परंपरा को जीवित करने का कार्य कर रहे हैं। गीता महोत्सव जैसे आयोजनों के माध्यम से यह नृत्य नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का काम कर रहा है। दर्शकों का कहना है कि झूमर नृत्य ने न केवल उन्हें मनोरंजन दिया, बल्कि पंजाब की गहरी सांस्कृतिक जड़ों से भी परिचित कराया।
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