प्रदीप पिलानिया
कुरुक्षेत्र। दुश्मन चाहे जैसा भी हो दूं मिला राख में ये वर दे, बलि-बलि जाऊं इस माटी पर मन भरे नहीं ऐसा वर दे...। यह पंक्तियां फौजी धर्मवीर पर सटीक बैठती हैं। नगालैंड में फरवरी 1995 में बम धमाकों में रीढ़ की हड्डी क्षतिग्रस्त के बाद भी उन्होंने बेटे को मातृभूमि की रक्षा के लिए सेना में भेजा।
उनके पिता जसवंत सिंह भी सेना में सेवा दे चुके हैं। ऐसे में तीसरी पीढ़ी सेना में होने के कारण रतगल गांव का यह परिवार देश के प्रति समर्पित होने का जज्बा हर किसी में भर रहा है।
नायक धर्मवीर की पत्नी सुनीता देवी ने बताया कि वर्ष 1995 में नगालैंड के दुर्गम पहाड़ी इलाकों में उपद्रवियों से मुकाबला करते समय उनके पति और उनके पांच साथी बम धमाकों की चपेट में आ गए। तीन मौके पर बलिदान हो गए और एक ने दो साल बाद उपचार के दौरान जान गंवा दी। पति की रीढ़ की हड्डी पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई।
वह आज भी पुणे के सैन्य अस्पताल में हैं। सेना उनकी नियमित देखभाल के साथ-साथ सैनिक के रूप में वेतन और छुट्टियां भी प्रदान करती हैं। सेना के जवान समय-समय पर धर्मवीर को उनके परिवार से मिलवाने के लिए घर लाते हैं और वापस अस्पताल ले जाते हैं। सुनीता ने बताया कि जिस समय पति घायल हुए उस समय उनका छोटा बेटा साहिल मात्र दो साल का था। बड़ा होने के बाद साहिल ने पिता व दादा के जज्बे से प्रेरित होकर देश सेवा को चुना। सुनीता ने बताया कि उनके पिता भी सेना में थे और शादी भी एक सैनिक परिवार में हुई। उन्होंने पति की इस स्थिति के बावजूद परिवार को संभाला तो देश सेवा का जज्बा परिवार में कम नहीं होने दिया। अपने छोटे बेटे साहिल को सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित किया। बड़े बेटे नीरज ने बताया कि उनकी मां ने कभी हिम्मत नहीं हारी, जिसका नतीजा है कि आज साहिल पंजाब की सीमा पर देश की रक्षा कर रहा है। संवाद
चिंतित होने के बाद भी बहू को दिया हौंसला
सुनीता ने बताया कि भारत-पाक सीमा पर युद्ध जैसी स्थिति के उन्हें बेटे को लेकर चिंता थी, लेकिन उन्होंने इसे कभी जाहिर नहीं होने दिया। साहिल की दो साल पहले शादी हुई थी। ऐसे में तनाव के बीच उन्होंने अपनी बहू को भी हिम्मत बंधाई, जो अपने पति की सुरक्षा को लेकर चिंतित थी।