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Kurukshetra News: फर्जी मुठभेड़ में पांच आरोपियों को अदालत की ओर से क्लीन चिट

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कुरुक्षेत्र। जिले के चर्चित डॉ. विनीता अरोड़ा हत्याकांड से जुड़ी एक कथित पुलिस मुठभेड़ मामले ने नया मोड़ ले लिया है। जिला अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अनिल कुमार ने मामले में पांच अभियुक्तों गियान, सुनील कुमार, विक्रमजीत, मनीष, और विक्रम को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने 10 जनवरी 2023 को हुई इस मुठभेड़ को कृत्रिम यानी फर्जी करार देते हुए पुलिस की जांच को पूरी तरह खारिज कर दिया। इस फैसले ने पुलिस महकमे की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं और हाल की अन्य मुठभेड़ों की विश्वसनीयता पर भी संदेह उत्पन्न किया है।
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तत्कालीन सीआईए-2 प्रभारी निरीक्षक प्रतीक (वर्तमान में एसटीएफ अंबाला डीएसपी) और उनकी टीम को सूचना मिली थी कि डॉ. विनीता अरोड़ा हत्याकांड के आरोपी बिना नंबर प्लेट की स्विफ्ट कार में पिहोवा की ओर से आ रहे हैं। पुलिस ने ज्योतिसर नहर के पास नाकेबंदी की। पुलिस का दावा था कि आरोपियों ने नाकाबंदी तोड़कर सरकारी गाड़ी एचआर 07 जीवी 2970 पर गोली चलाई। मिर्जापुर गांव के पास सतलुज-यमुना लिंक नहर और नरवाना नहर के बीच कथित तौर पर दोबारा गोलीबारी हुई जिसके जवाब में पुलिस ने फायरिंग की। इस दौरान अभियुक्त मनीष के पैर में गोली लगी। पुलिस ने पांच देसी पिस्तौल और कारतूस बरामद करने का दावा किया और अभियुक्तों पर आईपीसी की धारा 307 (हत्या का प्रयास) और शस्त्र अधिनियम की धारा 25, 27 के तहत मामला दर्ज किया।
9 अक्तूबर को न्यायाधीश अनिल कुमार ने 83 पेज के आदेश में कहा कि यह एक कृत्रिम मुठभेड़ की कहानी है। अभियोजन पक्ष साक्ष्य देने में पूरी तरह विफल रहा। आपराधिक कानून में संदेह साक्ष्य का स्थान नहीं ले सकता। सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया गया और हिरासत में मौजूद अभियुक्तों को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया गया। प्रत्येक अभियुक्त को रिहाई के सात दिनों के भीतर 25 हजार रुपये का मुचलका और जमानत बॉन्ड जमा करना होगा।
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अदालत में खुली पोल

मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष की कहानी ताश के पत्तों की तरह बिखर गई। गवाहों के बयानों में समय, स्थान और गोलीबारी की संख्या में गंभीर असंगतियां सामने आईं। निरीक्षक प्रतीक, जो शिकायतकर्ता और जांचकर्ता दोनों थे, की निष्पक्षता पर सवाल उठे। कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स ने सनसनीखेज खुलासा किया कि पुलिसकर्मी घटनास्थल पर उस समय मौजूद ही नहीं थे। एफएसएल रिपोर्ट ने साबित किया कि सरकारी वाहन पर गोली का निशान अभियुक्तों के हथियारों से मेल नहीं खाता। सबसे चौंकाने वाला तथ्य था कि मनीष जो गोली लगने के बाद अस्पताल में था। उसके हस्ताक्षर बरामदगी मेमो पर दिखाए गए, जो असंभव था।
कोई स्वतंत्र साक्ष्य नहीं

अदालत ने पाया कि पुलिस ने न तो कोई स्वतंत्र गवाह पेश किया और न ही सीसीटीवी फुटेज, फोटो या वीडियो जैसे समकालीन साक्ष्य प्रस्तुत किए। बरामदगी प्रक्रिया संदिग्ध थी और वाहन असुरक्षित हालत में एफएसएल को भेजा गया। बचाव पक्ष ने दावा किया कि यह मुठभेड़ डॉ. विनीता हत्याकांड को मजबूत करने के लिए गढ़ी गई थी, जिसे अदालत ने गंभीरता से लिया। इस फैसले ने जिला पुलिस की कार्यप्रणाली व हाल ही में हुई मुठभेड़ों की वारदातों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। पूर्व बार एसोसिएशन के प्रधान गुरतेज सिंह शेखों का कहना है कि इस तरह के फैसले पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करने के साथ उनकी जांच को भी संदेह के घेरे में लाती है।
इस फैसले पर चुप्पी साधे हुए है पुलिस

पुलिस अधीक्षक व अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। यह स्पष्ट नहीं है कि पुलिस इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील करेगी या नहीं। इस मामले ने पुलिस की मुठभेड़ों की प्रामाणिकता पर गंभीर सवाल उठाए हैं और जनता में चर्चा का विषय बना हुआ है।
ये था डॉ. विनीता हत्याकांड मामला, अभी भी अदालत में चल रही सुनवाई
जनवरी 2023 में सेक्टर 13 स्थित डॉ. अतुल अरोड़ा के क्लिनिक में नकाबपोश बदमाशों ने लूटपाट के इरादे से 59 वर्षीय डॉ. विनीता अरोड़ा पर हमला किया था। बदमाशों ने एगलेस केक के बहाने क्लिनिक में प्रवेश किया और हमले में डॉ. विनीता की मृत्यु हो गई। इस मामले में पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की थी और सुनवाई अभी भी अदालत में जारी है।
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