कुरुक्षेत्र। एलएनजेपी अस्पताल में तीन वर्ष पहले सितंबर 2017 में अत्याधुनिक ब्लड कंपोनेंट सेपरेटर मशीन आने से जहां जरूरतमंदों को रक्त, प्लेट-लेट्स और प्लाज्मा एक ही छत के नीचे मिलने की उम्मीद कोरोना महामारी के इस दौर में भी पूरी नहीं हो सकी। वैसे जिला प्रशासन की ओर से कोरोना संक्रमितों के लिए प्लाज्मा डोनेट करने की अपील जरूर की जा रही है, लेकिन जरूरतमंदों को प्लाज्मा कैसे उपलब्ध होगा और कितना भुगतान करना पड़ेगा या नि:शुल्क ये अभी स्पष्ट नहीं है। उधर, जिला सिविल सर्जन डॉ. सुखबीर सिंह ने कहा कि कुरुक्षेत्र में प्लाज्मा लेने की कोई सुविधा नहीं है।
जानकारी के अनुसार कुरुक्षेत्र और शाहाबाद स्थित मात्र एक-एक ब्लड बैंक में प्लाज्मा और प्लेट-लेट्स उपलब्ध हैं, लेकिन यहां मनचाहे दाम रुपये वसूले जा रहे हैं। ऐसे स्थिति में गरीब व्यक्ति कैसे उम्मीद लगा सकते हैं कि उन्हें जिला अस्पताल में बेहतर उपचार मिल सकता है? स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही के कारण एलएनजेपी अस्पताल में तीन साल पहले आई ब्लड कंपोनेंट सेपरेटर मशीन धूल फांक रही है। अब तक उक्त मशीन के लिए न तो लाइसेंस लिया गया और न ही स्थापित किया गया। डेंगू, एड्स, थैलेसीमिया और कोरोना संक्रमित मरीजों सहित अन्य कई श्रेणी के मरीजों के लिए बेहद उपयोगी मशीन डिब्बा बंद हालत में है। डेंगू के इस सीजन में पीड़ित मरीज निजी अस्पतालों एवं ब्लड बैंक से भारी रकम अदा कर प्लेटलेट्स खरीदने को मजबूर हैं। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इस मशीन को इंस्टॉल करने के लिए पूरे सेटअप पर करीब 40 से 50 लाख रुपये खर्च होंगे। बता दें कि मानव ब्लड में प्लाज्मा, प्लेटलेट्स और पेक्ड रेड ब्लड सेल्स जैसे कंपोनेंट्स होते हैं। ब्लड की एक यूनिट से तीन रोगियों की जान बचाई जा सकती है।
कोरोना, डेंगू, थैलेसीमिया, एड्स और बर्न के मरीजों को पड़ती है अलग-अलग जरूरत : डॉ. शैली
एलएनजेपी अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक और हृदय एवं छाती रोग विशेषज्ञ डॉ. शैलेंद्र ममगाईं शैली ने बताया कि थैलेसीमिया से पीड़ित मरीजों को लाल रक्त कणिकाएं (आरबीसी) की जरूरत होती है। ब्लड से आरबीसी अलग करके थैलेसीमिया के मरीजों को चढ़ाया जाता है। इसके अलावा डेंगू के मरीजों को प्लेटलेट्स चढ़ाए जाते हैं। इस मशीन से खून से प्लेटलेट्स अलग किए जाते हैं। कोरोना संक्रमित एवं बर्न केस यानी जले हुए मरीजों को बचाने के लिए प्लाज्मा की जरूरत होती है। यहां पर इस तरह की व्यवस्था नहीं है। एड्स के मरीजों को श्वेत रक्त कणिकाएं (डब्ल्यूबीसी) की जरूरत होती है। इस मशीन द्वारा खून से डब्ल्यूबीसी को अलग किया जाता है।
मशीन को अस्पताल की नई इमारत में किया जाएगा शिफ्ट : डॉ. विनोद
एनएनजेपी अस्पताल के पैथोलॉजिस्ट डॉ. विनोद तंवर ने बताया कि स्वास्थ्य विभाग की ओर से अस्पताल में उक्त मशीन उपलब्ध कराई गई थी, लेकिन उपकरण पूरे न हो पाने के कारण मशीन को स्थापित नहीं किया जा सका। हाल ही में स्वास्थ्य विभाग की ओर से -80 व -40 फ्रिजर एलएनजेपी अस्पताल भेजा गया है, तभी से मशीन को एलएनजेपी अस्पताल की नई बिल्डिंग में स्थापित करने के लिए प्रक्रिया शुरू कर दी है। अस्पताल में आगामी एक वर्ष तक ब्लड सेपरेटर मशीन के जरिये ब्लड कंपोनेंट्स मिलने की सुविधा शुरू हो पाएगी। मशीन को इंस्टॉल करने से पहले फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन विभाग (एफडीए) से अनुमति लेनी पड़ती है। एफडीए बाकायदा लाइसेंस जारी करेगा। इसके लिए एफडीए की टीम नये ब्लड बैंक का निरीक्षण भी कर चुकी है, जिसके निर्देशानुसार पार्टीशन करवाए जा रहे हैं।