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अर्जुन केवल योद्धा नहीं, संवेदनशील और धर्मनिष्ठ व्यक्तित्व : छाबड़ा

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कुरुक्षेत्र। गीता ज्ञान संस्थान में संगोष्ठी करते प्रबुद्धजन। विज्ञ​प्ति
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कुरुक्षेत्र। जीओ गीता संस्थान की मासिक गीता प्रवाह संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस दौरान जीओ गीता के सचिव मदन मोहन छाबड़ा ने कहा कि महाभारत युद्ध में अर्जुन विवेक, त्याग और कर्तव्यपरायणता पर अड़िग रहे। युद्धभूमि में अर्जुन ने अपने ही गुरुजनों, संबंधियों और मित्रों को सामने खड़ा देखा तो वे गहरे मोह और दुविधा में पड़ गए। उन्होंने अपने गांडीव (धनुष) को रख भगवान श्रीकृष्ण को युद्ध करने से इन्कार कर दिया। इसी विषाद की स्थिति में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म, धर्म और आत्मज्ञान का उपदेश दिया, जो संपूर्ण गीता का आधार बना। वे गीता प्रवाह संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे थे।
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उन्होंने कहा कि अर्जुन केवल योद्धा ही नहीं, संवेदनशील और धर्मनिष्ठ व्यक्तित्व भी थे। गीता का प्रथम अध्याय ‘अर्जुन विषाद योग’ मनुष्य के जीवन में आने वाले मानसिक संघर्ष और निर्णयहीनता की स्थिति को उजागर करता है। यह अध्याय सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी विवेक और कर्तव्य के मार्ग को अपनाना कितना आवश्यक है। छाबड़ा ने बताया कि स्वामी ज्ञानानंद की प्रेरणा से शुरू गीता प्रवाह संगोष्ठी से प्रबुद्ध वर्ग जुड़ रहा है। यह गीता के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

संगोष्ठी में गीता के पहले अध्याय अर्जुन विषाद योग पर मंथन हुआ। सेवानिवृत्त प्राचार्य सचिंद्र कुमार ने व्याख्यान दिया। इसमें उन्होंने अर्जुन विषाद योग से लेकर सगे-संबंधियों के प्रति त्याग को विस्तार से बताया। संगोष्ठी की अध्यक्षता विवि से सेवानिवृत्त प्रोफेसर आरके देशवाल ने की। इस अवसर पर विवेक कोहली, डॉ. भगत सिंह, डॉ. तेजेंद्र शर्मा, सुनीता दलाल, ऋषिपाल, प्रो. सुचिशुमिता, प्रो. एसएम गुप्ता, प्रो. सुरेश, कैप्टन परमजीत सिंह, हिंदी विभाग से लोकेश, सुनीता गुप्ता, क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष महेंद्र तंवर और गुर्जर महासभा के पूर्व प्रधान ओमप्रकाश राठी सहित अन्य प्रबुद्ध व्यक्ति मौजूद रहे।
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