कुरुक्षेत्र। श्री गो गीता गायत्री सत्संग सेवा के तत्वावधान में गौरी शंकर मंदिर सेक्टर-8 में आयोजित कथा के दौरान कथा वाचक अनिल शास्त्री ने कलियुग में श्रीमद्भागवत कथा श्रवण का महत्व बताया।
उन्होंने कहा कि भक्तिदेवी, ज्ञान और वैराग्य की पुष्टि के लिए जो उपाय भगवान नारायण ने आकाशवाणी के माध्यम से बताया था, उसका वास्तविक अर्थ खोजते हुए नारदजी बदरीवन पहुंचे और तपस्या करने का विचार करने लगे। तभी वहां उन्हें सनकादि मुनि मिले। सनकादि ऋषि ब्रह्माजी के चार मानस पुत्र सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार के नाम से प्रसिद्ध हैं। वह बड़े योगी, बुद्धिमान और विद्वान हैं। देखने में ये पांच वर्ष के बालक से प्रतीत होते हैं, किंतु वे पूर्वजों के भी पूर्वज हैं। वे सदा वैकुंठधाम में निवास करते हैं और निरंतर हरिकीर्तन में लीन रहते हैं। नारदजी ने सनकादि मुनियों से पूछा कि भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की पुष्टि कैसे होगी, तब मुनियों ने बताया कि ऋषियों ने संसार में दुःख निवृत्ति के अनेक मार्ग बताए हैं, लेकिन वे सब कष्टदायी हैं और परिणामस्वरूप स्वर्ग देने वाले हैं।
शास्त्री ने बताया कि अभी तक भगवान की प्राप्ति कराने वाला मार्ग गुप्त ही है। उसे बताने वाला भी भाग्य से ही मिलता है। आकाशवाणी ने जो सत्कर्म के लिए कहा है, उसे बताया। चार प्रकार के यज्ञ होते हैं द्रव्ययज्ञ, तपोयज्ञ, योगयज्ञ और ज्ञानयज्ञ ये सब तो स्वर्ग आदि की प्राप्ति कराने वाले कर्मों की ओर ही संकेत करते हैं, लेकिन ज्ञानियों ने ज्ञानयज्ञ को ही सत्कर्म (मुक्तिदायक कर्म) का सूचक माना है। वह श्रीमद्भागवत का पारायण है, जिसका गान शुकादि महानुभावों ने किया है। उसके शब्द सुनने से ही भक्ति, ज्ञान और वैराग्य को बड़ा बल मिलेगा। इससे ज्ञान-वैराग्य का कष्ट मिट जाएगा और भक्ति को आनंद मिलेगा। जैसे सिंह की गर्जना सुनकर भेड़िए भाग जाते हैं, उसी प्रकार श्रीमद्भागवत सुनने से कलियुग के सारे दोष नष्ट हो जाएंगे। इस मौके पर नरेश गर्ग, ब्राह्मण एवं तीर्थोद्धार सभा के प्रधान येशेंद्र शर्मा, संरक्षक जयनारायण शर्मा, पूर्व प्रधान श्याम सुंदर तिवारी, डॉ. पुरुषोत्तम शास्त्री, सूरजभान कटारिया, अशोक गर्ग, नवीन बंसल, सुनीता और मीनू गर्ग सहित अन्य मौजूद रहे।