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गुरुकुल के शून्य लागत कृषि मॉडल के मुरीद हुए कृषि वैज्ञानिक

Sun, 07 May 2017 12:33 AM IST
ब्यूरो/कुरुक्षेत्र,अमर उजाला
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agriculture modal - फोटो : अमर उजाला
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गुरुकुल कुरुक्षेत्र के कृषि फार्म पर शून्य लागत आध्यात्मिक कृषि मॉडल से की जा रही खेती को देख भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक डॉ. त्रिलोचन महापात्रा और उनके साथ आई वैज्ञानिकों की टीम दंग रह गई।
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महानिदेशक के नेतृत्व में पहुंचे कृषि वैज्ञानिकों के दल ने न केवल इस कृषि मॉडल की तकनीकी जानकारी हासिल की बल्कि इसे किसानों के हित में बड़ा कदम भी करार दिया। उन्होंने माना कि रासायनिक खादों का प्रयोग कर जहरीली कृषि को त्यागकर शून्य लागत आध्यात्मिक कृषि अपनाने की आवश्यकता है। इसके लिए किसानों को जागरूक करना होगा।

महानिदेशक डॉ. माहापात्रा  उन्नत, प्रगतिशील और अत्याधुनिक गोशाला को देखने और आचार्य देवव्रत द्वारा यहां पर अपनाई जा रही नवीनतम तकनीक को जानने व समझने के लिए अपनी पूरी टीम सहित गुरुकुल कुरुक्षेत्र पहुुंचे थे। उनके साथ नौनी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एचसी शर्मा भी अपने कृषि वैज्ञानिकों के साथ गुरुकुल की गोशाला और शून्य लागत आध्यात्मिक कृषि फार्म को देखने के लिए पहुंचे। हिमाचल प्रदेश के  राज्यपाल एवं गुरुकुल के संरक्षक आचार्य देवव्रत और गुरुकुल के प्रधान कुलवंत सिंह सैनी ने उनका स्वागत किया। इसके उपरांत आचार्य देवव्रत ने प्रतिनिधि मंडल में आए सभी वैज्ञानिकों को बारी-बारी से गुरुकुल की गोशाला, केंचुआ खाद निर्माण केंद्र, जीवामृत, घनजीवामृत व कीटनाशक निर्माण केंद्र, अश्वशाला आदि का निरीक्षण कराया।
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गुरुकुल की गोशाला की देशी नस्ल की गायों के स्वास्थ्य और उनकी दूध देने की क्षमता को देखकर डॉ. महापात्रा सहित प्रतिनिधिमंडल में आए सभी डॉक्टर हैरत में पड़ गये। मुख्य रूप से थारपारकर, साहीवाल और गिर जैसी देशी नस्ल की गायों से 20 लीटर तक दुग्ध उत्पादन की जानकारी मिलने पर डॉ. महापात्रा ने प्रबंधन को सराहा। उन्होंने गोशाला में गायों को दिये जाने वाले चारे से लेकर फीड़, प्लांट, उनके रहने के बाड़े, एसी शैड, ऑटोमेटिक मिल्क पार्लर आदि का दौरा किया। आचार्य देवव्रत ने बताया कि गोशाला से प्राप्त हुए गोबर और गोमूत्र का उपयोग शून्य लागत आध्यात्मिक कृषि में किया जाता है जिसके लिए गोबर गैस और अन्य संयंत्र लगाये गये हैं।

इसके पश्चात यह प्रतिनिधि मंडल गुरुकुल के कृषि फार्म पर पहुंचा। आचार्य देवव्रत ने बताया कि एक ओर जहां किसान रासायनिक खाद व कीटनाशकों के इस्तेमाल से कम उत्पादन के साथ भूमि की उर्वरा शक्ति को नष्ट कर रहे हैं, वहीं शून्य लागत आध्यात्मिक कृषि को अपनाकर किसान न केवल दोगुना उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं बल्कि इससे भूमि की उर्वरा शक्ति में भी वृद्धि होगी। उन्होंने बताया कि एक देशी गाय से 30 एकड़ भूमि पर शून्य लागत आध्यात्मिक कृषि की जा सकती है।

गायों का ऐसा रखरखाव बड़े-बड़े सरकारी संस्थानों में भी नहीं
गोशाला के पूरे निरीक्षण के उपरांत डॉ. महापात्रा ने बताया कि जिस प्रकार की गायें गुरुकुल की गोशाला में हैं, ऐसी गाय तो बड़े-बड़े सरकारी संस्थानों में भी देखने को नहीं मिलती और उनके दुग्ध-उत्पादन की क्षमता को वाकई हैरान कर देने वाली है। यही नहीं यहां अपनाया जा रहा शून्य लागत कृषि मॉडल भी बेहद सराहनीय है, सभी किसानों को रासायनिक खादों का प्रयोग कर जहरीली कृषि को त्यागकर शून्य लागत आध्यात्मिक कृषि अपनाने की आवश्यकता है।
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