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अब भारत को कृषि प्रधान देश कहना बेमानी

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अमर उजाला ब्यूरो
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कुरुक्षेत्र। अनेकों वर्षों से भले ही भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता रहा हो लेकिन अब यह कहना बेमानी होगा। देश में जहां कृषि का रकबा लगातार घटता जा रहा है वहीं वर्तमान में प्रत्यक्ष रूप से खेती करने वाले किसान परिवारों की संख्या भी महज 10.5 (14 करोड़) फीसदी ही रह गई है। देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी वर्ष 2017 के आंकड़ों के अनुसार 19 फीसदी रह गई थी जबकि वर्ष 1950 में यह आंकड़ा 52 फीसदी था। यह खुलासा जिला कृषि विभाग के कार्यालय में पहली बार लगाई गई वॉल माउंटेड परमानेंट प्रदर्शनी के लिए जुटाए तथ्यों में किया गया है, जिन्हें देख हर कोई हैरान है। कृषि विशेषज्ञों की मानें तो किसानों का कृषि के प्रति बदलाव बदलती परिस्थिति के चलते हुआ है जबकि किसानों का कहना है कि अब तक की रही सरकारों की कृषि एवं किसान के प्रति रही नीतियों व किसान की अनदेखी के चलते कृषि घाटे का सौदा बन चुकी है। आसमान छू रही फसलों की लागत व खरीद को लेकर सही नीति न होने के कारण किसानों का कृषि से पूरी तरह मोह भंग हो चुका है।


जीडीपी में हरियाणा का 25 फीसदी योगदान

भले ही देश भर में कृषि क्षेत्र को लेकर प्रदर्शनी के लिए जुटाए तथ्य चिंतनीय है , लेकिन इसी बीच हरियाणा का कृषि क्षेत्र का जीडीपी में अभी भी करीब 25 फीसदी योगदान है। प्रदर्शनी में दर्शाए गए आंकड़ों के अनुसार हरियाणा करीब 1.8 करोड़ टन खाद्य अनाज की उपज कर देश के कृषि उद्योग में सराहनीय योगदान दे रहा है। देश का 60 फीसदी बासमती चावल यहीं से निर्यात होता है।
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प्रदर्शनी में 125 फोटो दर्शा रहे कृषि गतिविधियां

विशेष रूप से तैयार की गई इस प्रदर्शन को 125 फोटो व आलेखों को सात भागों में विभाजित किया गया है। प्रदेश भर में यह अपने स्तर की अनोखी प्रदर्शनी है, जिसे देख यहां आने वाले अधिकारियों से लेकर किसान तक ठहर जाते है और इसमें दी गई जानकारी गहनता से हासिल करते है। प्रदर्शनी में खेती की तकनीक से लेकर सरकार की ओर से चलाई जा रही क्रियाकलापों, योजनाओं व उत्पादन को बढ़ाने को लेकर भी व्याप्त जानकारी दी गई है।

तीन हजार परिवार हर रोज छोड़ रहे खेती : चढूनी

अखिल भारतीय किसान संघ कोर कमेटी सदस्य व भाकियू के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी का कहना है कि सरकार की नीतियों का ही परिणाम है कि हर रोज तीन हजार किसान परिवार खेती छोड़ रहे हैं। अमेरिका की नीतियों के षड्यंत्र में देश का कृषि व्यवसाय फंस कर रह गया है। खेती पूरी तरह से घाटे का सौदा बन चुकी है और किसान मुंह मोड़ चुके है। सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए, ताकि देश के अन्न के भंडार भरे रहे और किसी को भुखमरी का सामना न करना पड़े।
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विशेष रूप से किसानों को जागरूक करना ही उद्देश्य : कर्मचंद

कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के उपनिदेशक डॉ. कर्मचंद का कहना है कि आज अधिकतर किसान पढ़े-लिखे हैं। उन्हें अधिक से अधिक जानकारी देने के लिए ही विशेष प्रदर्शनी तैयार कराई गई है। इस प्रदर्शनी में देश से लेकर प्रदेश भर के कृषि हालात को दर्शाया गया है तो किसानों को प्रोत्साहित करने का भी प्रयास किया गया है। किसानों की कृषि के प्रति बदल रही सोच अवश्य ही चिंता का विषय है।
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