बागड़ी लोकगीतों के साथ चित्रण का प्रशिक्षण
कुरुक्षेत्र। हरियाणवी संस्कृति को समृद्ध करने में बागड़ क्षेत्र की संस्कृति का महत्वपूर्ण योगदान है। बागड़ी चित्रण कला से ही हरियाणवी लोककला का समृद्ध स्वरूप सामने आया है। हरियाणवी लोककला के विकास में बागड़ की महिलाओं का महत्वपूर्ण योगदान है। यह विचार बागड़ क्षेत्र की महिलाओं को लेकर चित्रण कार्यशाला में पहुंची डॉ. अर्चना सुहासिनी ने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए रखे।
उन्होंने कहा कि बागड़ क्षेत्र में जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत लोककला के अनेक चित्रण देखने को मिलते हैं। इस क्षेत्र की लोककला पर राजस्थानी प्रभाव भी देखने को मिलता है। डॉ. अर्चना ने कहा कि बागड़ी चित्रण हमारे प्रदेश की वो सांस्कृतिक धरोहर है, जिसका संरक्षण किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बागड़ क्षेत्र में जन्म के अवसर पर घर की दीवारों पर थापे बनाए जाते हैं। इसके साथ ही छठी के अवसर पर बेहमाता का थापा बनाया जाता है। इसके अतिरिक्त बागड़ की महिलाएं धनतेरस, दीपावली, घणघोर, अहोई, ब्याह आदि के चित्रण भी घर की दीवारों पर बनाती हैं। इन चित्रण के माध्यम से वे जहां एक ओर बागड़ की संस्कृति का संरक्षण करती हैं वहीं पर दूसरी ओर लोक देवी-देवताओं को नमन भी करती हैं। इस मौके पर उनके साथ आई अनारकली एवं ओमवती ने चित्रणों के गीत गाकर बागड़ क्षेत्र के चित्तण बनाकर प्रतिभागियों को प्रशिक्षण दिया। उन्होंने गूगा नवमी, घरबत, अहोई अष्टमी, ब्याह, बेहमाता आदि के चित्रण प्रतिभागियों को बनाकर दिखाए। इसके साथ-साथ उन्होंने बागड़ क्षेत्र में गाए जाने वाले लोकगीत एवं लोक नृत्य का भी परिचय कार्यशाला में प्रतिभागियों को दिया। उन्होंने घरेलू बर्तनों, कुठला, कोठी, ठाठिया आदि पर बनाए जाने वाले चित्रणों के विषय में भी प्रतिभागियों को जानकारी दी। इस अवसर पर आर्य कन्या महाविद्यालय शाहाबाद की ललित कला विभाग की अध्यक्ष संतोष भी उपस्थित थी। उन्होंने हरियाणा कला परिषद की ओर से आए हुए व्याख्यानकर्ताओं को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया। उनके साथ ओमवती व अनारकली भी उपस्थित थी। इस मौके पर कार्यशाला प्रभारी लवदीप कौर व हरमोहन आदि मौजूद रहे।