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Karnal News: सूखा हो या पाला, सरसों की पैदावार होगी आला

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1002 खेत में खड़ी सरसों की नई किस्म सीएस-68।
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देव शर्मा
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करनाल। केंद्रीय मृदा एवं लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई) करनाल के वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन के समय में सरसों की एक ऐसी किस्म सीएस-68 तैयार की है, जो बहुतनाव (मल्टीस्ट्रेस) सहनशील है। ये किस्म लवणीय मिट्टी के साथ सूखा, उच्च तापमान और पाले में भी लहलहाएगी।
खास बात ये है कि देश में मौजूद किस्मों में इसकी पैदावार सर्वाधिक होगी। ये कई रोगों के प्रति प्रतिरोधी है। भारत सरकार की किस्म पहचान समिति (बीआईसी) ने इसे रिलीज कर दिया है। किसानों को बीज अगले साल वर्ष 2026 में उपलब्ध करा दिया जाएगा। सीएस-68 किस्म को मुख्य रूप से हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और मध्यप्रदेश राज्यों के लिए रिलीज किया गया है। इस किस्म को विकसित करने वाले वैज्ञानिकों में डॉ. विजयता सिंह, डॉ. जोगिंद्र सिंह, डॉ. आरके यादव (निदेशक सीएसएसआरआई), डॉ. प्रबोधचंद्र शर्मा , डॉ. रवि किरण केटी (लखनऊ), डॉ. राम प्रकाश (हिसार), डॉ. मुदस्सिर अहमद खान व डॉ. चंपा लाल खटीक (फतेहपुर शेखावाटी, राजस्थान) शामिल हैं।
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ये हैं विशेषताएं
डॉ. विजयता सिंह ने बताया कि सीएस-68 में कई विशेषताएं हैं। सामान्य भूमि में उपज 28 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। लवणीय भूमि में उपज 22 से 24 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। सामान्य किस्मों में सामान्य भूमि में पैदावार 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। लवणीय भूमि में सरसों पैदा ही नहीं होती, यदि हो भी जाए पैदावार छह से आठ क्विंटल तक ही होती है।
- ये बहुतनाव सहनशील (मौसम में बदलाव को सहने की क्षमता) होने के साथ इसमें 9 से 13 डेसी साइमन प्रति मीटर तक लवणता सहन करने की क्षमता है। 9 से 9.4 पीएच मान तक क्षारीयता को भी बर्दाश्त कर सकती है। अन्य किस्में 6 से 10 डेसी साइमन की लवणता और 8.5 पीएच मान क्षारीय सहन करने की क्षमता ही रखती हैं।
जल्द मिलती है उपज : इस किस्म में तेल की मात्रा 41 से 42 प्रतिशत है। अन्य में 38-40 प्रतिशत रहती है। ये किस्म 128 से 131 दिन के अंदर पक जाती है। अन्य किस्में 130-140 दिन में पकती हैं। पौधे की ऊंचाई 185 सेमी हैं और 1000 दानों का भार 5.2 ग्राम है। इस किस्म की बुवाई का समय 01 से 31 अक्तूबर तक रहेगा।
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रोग प्रतिरोधी : वैज्ञानिक डॉ. विजयता सिंह ने बताया कि नई किस्म सीएस-68 पत्ती झुलसा (अल्टरनेरिया ब्लाइट), सफेद रतुआ, चूर्मिल अर्शिता (पावडर मिल्डस) और जड़ तना गलन रोग के प्रति रोधी हैं। इसके अलावा चैंपा रोग भी न्यूनतम ही रहेगा।

1002 खेत में खड़ी सरसों की नई किस्म सीएस-68।

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