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Karnal News: कम यूरिया में बेहतर पैदावार देने वाली गेहूं की किस्में होंगी तैयार

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देव शर्मा
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करनाल। कृषि प्रधान देश में फसलों की अच्छी पैदावार के लिए भले ही यूरिया जैसी खाद का प्रयोग आवश्यक हो लेकिन इससे होने वाले नाइट्रस ऑक्साइड आदि ग्रीन हाउस गैसों के रिसाव का प्रभाव जलवायु परिवर्तन में देखा जा रहा है। जिसे कम करने के लिए केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई) करनाल ने जापान के साथ मिलकर कम यूरिया में पैदा होने वाली गेहूं की किस्में तैयार करने पर शोध शुरू किया है। संभावना है कि आगामी कुछ साल में ऐसी किस्में तैयार हो जाएंगी, जो 25 प्रतिशत तक कम यूरिया में बेहतर पैदावार देंगी।
सीएसएसआरआई करनाल ने इसके लिए जापान नाइट्रोजन रिसर्च सेंटर फॉर एग्रीकल्चरल साइसेंस (जिरकॉस) के साथ मिलकर अनुसंधान शुरू कर दिया है। इसमें सबसे पहले देश में प्रचलित गेहूं की बेहतर पैदावार वाली किस्मों को लिया गया है। अनुसंधान कार्य में भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (आईआईडब्ल्यूबीआर) करनाल भी शामिल है। इसी संस्थान की ओर से विकसित की गई डीबीडब्ल्यू 187, डीबीडब्ल्यू 222, डीबीडब्ल्यू 110, डीबीडब्ल्यू 252 व डीबीडब्ल्यू 303 किस्मों पर कार्य शुरू कर दिया है। इन किस्मों में जीन परिवर्तन करके इन्हें कम यूरिया में बेहतर पैदावार देने वाली नई किस्मों के रूप में बदला जाएगा। गंगा के तटीय मैदानों के लिए नाइट्रोजन कुशल गेहूं उत्पादन प्रणाली विकसित करने की ये परियोजना जापान इंटरनेशनल को-ऑपरेशन एजेंसी (जाइका) नई दिल्ली द्वारा वित्त पोषित है। इसमें सीएसएसआरआई व आईआईडब्ल्यूबीआर करनाल के साथ-साथ आईएआरआई और बीआईएसए जैसे संस्थान भी शामिल हैं।
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प्रचलित किस्मों का होगा नया वर्जन
सीएसएसआरआई के प्रधान अनुसंधानकर्ता डॉ. अजय कुमार भारद्वाज ने बताया कि शोध के बाद जो किस्में तैयार होंगी, वह इन्हीं प्रचलित किस्मों का नया वर्जन यानी नई किस्में होंगी। इसके लिए जैविक नाइट्रोजन अवरोधन तकनीक (बीएनआई) का प्रयोग किया जा रहा है। प्रयास ऐसी किस्में विकसित करने का है, जिनमें यूरिया का प्रयोग करीब 25 प्रतिशत तक कम हो जाए। मौजूदा समय में गेहूं में औसतन 150 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से यूरिया का प्रयोग किया जाता है, नई किस्में तैयार होने के बाद इसे 110 या 120 किग्रा प्रति हेक्टेयर पर लाया जा सकेगा।
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नाइट्रोजन का पर्यावरण में रिसाव होगा कम
प्रधान अनुसंधानकर्ता डॉ. अजय कुमार भारद्वाज ने बताया कि यूरिया बचेगी तो नाइट्रोजन का पर्यावरण में रिसाव भी कम होगा। ग्रीन हाउस गैसेस, खासकर नाइट्रस ऑक्साइड कम बनेगी तो मिट्टी की सेहत अच्छी रहेगी तो भविष्य में फसलों की पैदावार बेहतर होगी। उन्होंने बकाया कि जो यूरिया खेतों में डाला जाता है, उसका 30 प्रतिशत ही पौधे को मिलता है, शेष रिसाव में चला जाता है। ये पर्यावरण के साथ-साथ भूमिगत जल को भी प्रदूषित करता है। जापान में इसका परीक्षण कर लिया गया है, अब गेहूं की भारतीय किस्मों पर शोध चल रहा है।
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