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Karnal News: विश्व शांति के लिए खतरा है युद्ध, विवश दिख रहा यूएनओ

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करनाल। इस्राइल-फलस्तीन संघर्ष दशकों पुराना है। इस संघर्ष की चिंगारी सात अक्तूबर को इस्राइल पर हुए हमास के भयावह राकेट हमले के बाद और भड़क उठी। इस्राइल में यह गंभीर आक्रमण सिमकैट टोरा (एक सांस्कृतिक कार्यक्रम) के दिन किया गया।
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इस यु्द्ध के चलते काफी लोग हताहत हुए। इसकी सबसे बड़ी कीमत निर्दोष लोगों को चुकानी पड़ी। इसमें बड़ी संख्या में बच्चे, युवा और महिलाएं शामिल हैं। अभी तक इस युद्ध में 20 हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। हमास के हालिया आतंकी हमले के संदर्भ में हमें इस आतंकी संगठन को समझने की जरूरत है। हमास का गठन 1987 में हुआ था, जब इस्राइल ने गाजा क्षेत्र से अपना कब्जा हटा लिया और वर्ष 2007 में उसने गाजा पट्टी पर नियंत्रण कर लिया।

दुनिया जानती है कि फलस्तीन के हिस्से की काफी जमीन इस्राइल ने जोर जबरदस्ती कर छीन ली है। जब से फलस्तीन में अलगाव हुआ तो उसके बाद से हमास का ये मकसद रहा है कि वह इस्राइल के कब्जे वाले अपने पुराने इलाकों को बल पूवर्क वापस ले।
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शायद इसी कारण उनसे खुफिया एजेंसियों की आंखों में धूल झोंककर यह हमला किया है। इस मसले पर संयुक्त राष्ट्र की भूमिका उस सुरक्षा कर्मी जैसी है, जो आज अपनी ड्यूटी की रस्म अदायगी बिना हथियार के कर रहा है।

जापान में परमाणु बम गिराने के बाद उस समय की वैश्विक ताकतों ने यूएनओ को 1945 में उपनिवेशक और गरीब मुल्कों को आशा की एक किरण दिखाई कि अब विश्व शांति स्थायी होगी। लेकिन वास्तविकता में आज यह संस्था, इससे कोसो दूर विकसित देशों के हाथों की मात्र कठपुतली बनकर रह गई है। यूएनओ अमेरिका की आर्थिक रहमोकरम पर अस्तित्व में है, जो इस्राइल के साथ खड़ा है। इसके चलते जब इस्राइल से यूएनओ के महासचिव ने हिंसा रोकने की बात कही, तो इसकी प्रतिक्रिया में इस्राइल के प्रतिनिधि ने यूएनओ के महासचिव से इस्तीफे की मांग कर दी।

ये बड़े आश्चर्य की बात है कि दुनिया में सबसे ज्यादा कमाई करने वाले देश हथियारों और लड़ाई के साज-सामान बेचकर मोटी रकम कमाते हैं। हथियार बेचने वाले अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और जर्मनी आदि, वही देश हैं, जो यूएनओ के वित्तपोषक हैं।

युद्ध किसी समस्या का हल नहीं हैं। कहीं भी दो देशों के मतभेद आतंकवाद के जरिये नहीं मिटाए जा सकते। मेरी नजर में ऐसी समस्या का हल आपसी मोहब्बत और भाईचारे को बढ़ाकर एवं आपसी बैर और असंतोष को तिलांजलि देकर ही संभव है।
विशेषज्ञ की राय
अमर उजाला विश्वसनीय समाचार पत्र है, जिसने यूपीएससी, एचपीएससी, नेट, जेआरएफ व अन्य परीक्षाओं में पूछे जाने वाले सामयिक विषयों पर युवाओं को आलेख लिखने के लिए प्रेरित किया है। इसके माध्यम से युवा वर्तमान मुद्दों से रूबरू होंगे। वर्तमान परिस्थितियों में हमास-इजरायल युद्ध एक गंभीर विषय है। इसने विश्व शांति के लिए एक गंभीर खतरा उत्पन्न कर दिया है। यूक्रेन-रूस युद्ध और हमास- इजरायल युद्ध ने तीसरे विश्व युद्ध जैसे हालात उत्पन्न कर दिए हैं। हालांकि ऐसे युद्धों को रोकने एवं विश्व शांति के लिए 25 अप्रैल 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई और 193 शांति प्रिय देशों ने इसकी सदस्यता ग्रहण की, लेकिन इसके सदस्य देशों के बीच संवेदनशील विषयों पर हमेशा राजनीति होती रही। कुछेक मामलों को छोड़ दें तो अधिकतर मामलों को संयुक्त राष्ट्र संघ सुलझाने में असफल रहा। भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर का मामला इसका जीता जागता उदाहरण है। यह सोवियत संघ और ईरान विवाद, बर्लिन विवाद आदि को भी सुलझाने में असफल रहा। इसका कारण यह है कि भारत जैसे देश को वीटो शक्ति नहीं दी गई। विश्व शांति के लिए भारत जैसे देशों को संयुक्त राष्ट्र संघ में वीटो शक्ति सहित अमेरिका और चीन जैसा स्थान देने की अति आवश्यकता है। इन विषयों पर अधिकतर लेख बहुत सुंदर शैली में लिखे गए हैं लेकिन उनमें सही परिस्थितियों का अभाव है।   - प्रो. गोपाल प्रसाद, निदेशक, डॉ. बीआर आंबेडकर अध्ययन केंद्र, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र
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