एक जमाना था, जब शहर से लेकर गांव तक बड़े-बड़े पेड़ों की हर डाल पर सावन में झूले पड़ जाते थे, युवतियां और महिलाएं अपने घरों के दैनिक कार्यों को निपटाकर झूला झूलने के लिए निकल जाती थीं, घंटों तक सावन के पारंपरिक गीतों के बीच झूले की पींगे बढ़ाती थी। उनके इस कार्य को त्योहार का एक हिस्सा मानकर परिवार के लोग भी सहयोग करते थे, लेकिन अब तो न बड़े वृक्ष रहे और न ही कहीं झूलें दिखाई देते हैं।
जब सावन आने वाला होता था, घरों के पुरुष चिंता करने लगते थे कि घर की बहू-बेटियों के झूलों के लिए रस्सियां बनानी हैं। जो बेटियां अपने ससुराल में होती थीं, उन्हें भी इंतजार रहता था कि सावन में उनके भाई या पिता उन्हें मायके ले जाने के लिए आएंगे। उनके मायके आने से पहले ही झूले डाल दिए जाते थे। महिलाएं भी नए-नए सावन के गीतों को याद करने लगती थीं। जो नई बहुएं होती थीं, जो मायके नहीं जा पाती थीं, उन पर सावन के गीतों को सुनाने का अधिक दबाव रहता था, इसलिए वह भी पहले से गीतों को याद करती थीं। सावन के आने पर झूला झूलना शुरू हो जाता था, पींगें बढ़ाते हुए गीत गाए जाते थे। इसके लिए महिलाओं में एक खास उत्साह होता था। इस दौरान घरों में पकवान बनाने की तैयारी भी पहले से ही शुरू हो जाती थी। पूरे सावन को ही उत्साह के साथ मनाया जाता था।
अब भी सावन तो आता है, फुहारें भी पड़ती हैं, लेकिन झूलों की परंपरा अब कहीं दिखती नहीं है और न ही कहीं उत्साह दिखता है। कुछ गांव हैं, जहां अभी भी झूले पड़े दिख जाते हैं लेकिन शहरों में तो ये परंपरा लगभग लुप्त हो चुकी है, शहर में बड़े पेड़ भी मुश्किल से ही मिलते हैं। कुछ स्कूलों में जरूर बच्चों के लिए झूले डाल दिए जाते हैं। अब कांवड़ लाने पर अधिक जोर रहता है, महिलाएं मंदिरों पर जाकर पूजा करती हैं। भक्तिभाव में कोई कमी नहीं लेकिन झूलों की परंपरा जरूर प्रभावित हुई है।
- मिथलेश, पाल नगर करनाल