फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मौसम परिवर्तन ने बढ़ाई किसानों की धड़कन

विज्ञापन
विज्ञापन
गेहूं की फसल के लिए यह नाजुक समय है लेकिन प्रकृति की मार ने किसानों की हालत खराब कर दी है। लगातार बेमौसमी बारिश और हवा चलने के कारण गेहूं के उत्पादन पर फर्क पड़ेगा। किसानों को चिंता है कि कहीं कर्ज तो क्या वह ब्याज भी चुकता न कर पाएं। कलवेहड़ी गांव के किसान ईश्वर सिंह व नबीपुर के कमल कांबोज ने कहा जिन क्षेत्र में केवल गेहूं ही उगाया जा रहा है और फसल पर मार पड़ती है तो किसान के पास कुछ नहीं बचेगा। देश में वैदर फॉरकास्टिंग के सिस्टम अब तक ऐसे विकसित नहीं कि दो-तीन महीने पहले मौसम के पूर्वानुमान बता सकें। महज दस या 15 दिन पहले या तत्काल ही सूचनाएं मिलती हैं जिस कारण किसान कार्ययोजना बनाने में सक्षम नहीं। जिले में मार्च ये अब तक 76.7 एमएम बरसात हो चुकी है। जबकि इस महीने में नाममात्र ही बारिश हुआ करती थी। फरवरी में 74.14 एमएम बारिश हुई। इस साल अब तक करीब 172.5 एमएम बारिश हो चुकी है। वर्षा के साथ तेज हवा चलने से गेहूं की फसल की जड़ें हिल गई हैं। बालियों में दाना विकसित नहीं होगा।
विज्ञापन

केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के मौसम विभाग के अनुसार बुधवार को अधिकतम तापमान 24.0 डिग्री व न्यूनतम 13.8 डिग्री सेल्सियस रहा। नमी 89 प्रतिशत रही। 1.4 एमएम बारिश हुई। मौसम विभाग का पूर्वानुमान है कि 14 मार्च तक बादल छाए रहने और बूंदाबांदी व बारिश की भी संभावना है। 15 मार्च की शाम को मौसम साफ होगा लेकिन अगले दिन भी हल्के बादल छाए रह सकते हैं।
जलवायु परिवर्तन पैदा कर सकता है खाद्य सुरक्षा पर खतरा
जलवायु परिवर्तन के दौर में पर्यावरण असंतुलन के चलते प्रकृति पलटवार कर रही है। बेमैसमी बारिश के कारण गेहूं की फसल को जो नुकसान हुआ है इससे स्पष्ट संकेत सामने आए हैं कि भविष्य में देश की खाद्य सुरक्षा को खतरा पैदा होने की संभावना बनेगी। करीब 130 करोड़ की आबादी वाले देश में पिछले साल 103 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन हुआ था। देश में गेहूं की घरेलू खपत इतनी है कि बहुत कम मात्रा में गेहूं निर्यात किया जाता है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि खाद्यान्न की कितनी खपत है। जनसंख्या बढ़ने और प्रकृति की मार से फसलों को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं।
विज्ञापन

भारतीय कृषि वैज्ञानिक चयन मंडल के पूर्व अध्यक्ष, पूर्व कृषि आयुक्त भारत सरकार एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. गुरबचन सिंह ने कहा कि पर्यावरण असंतुलन को लेकर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने 2001 के बाद देश में सर्वेक्षण किया था। उस समय प्रकृति का प्रकोप शुरू हो गया था। पाया गया कि कम समय में ज्यादा बारिश हो रही है या वर्षा स्थानांतरित हो गई। प्रकृति की मार से बचने के लिए किसानों को मिश्रित कृषि प्रणाली पर आना होगा। उसके पास गेहूं, धान, फल, मछली पालन, मुर्गी पालन, पशुपालन, बकरी पालन, मशरूम उत्पादन, सब्जी उत्पादन सहित कई काम साथ जोड़ने होंगे। यदि प्राकृतिक कारणों से एक फसल खराब होगी तो अन्य स्रोत की आमदनी से किसान भूखा नहीं रहेगा। सभी राज्यों में सरकारें कृषि से जुड़े धंधों पर अनुदान दे रही हैं। वह राज्य सरकारों को जल्द पत्र भेजेंगे कि पांच एकड़ तक के किसानों के लिए सभी अनुदान एक जगह मुहैया करवाएं। किसान के पास रोजाना की आमदनी का साधन होगा तो वह सक्षम होगा।
विज्ञापन

जिले में मार्च में पिछले सालों में हुई वर्षा के आंकड़े
वर्ष वर्षा (एमएम में)
2008 00
2009 2.6
2010 00
2011 10.9
2012 0.4
2013 5.8
2014 51.6
2015 128.5
2016 46.2
2017 7.8
2018 00
2019 7.4
2020 अब तक 76.7
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें