फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Karnal News: अंदर से दवा मिली नहीं, हाथ में पर्ची देख मरीजों को पुकारते हैं मेडिकल स्टोर संचालक

विज्ञापन
विज्ञापन
- कल्पना चावला अस्पताल और जन औषधि केंद्र में दवा न मिलने से मरीजों की मजबूरी बना बाजार
विज्ञापन

माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज अस्पताल में दवाओं की लगातार कमी अब एक बड़े कारोबार का कारण बनती नजर आ रही है। अस्पताल में जरूरी दवाएं उपलब्ध नहीं और इमरजेंसी के पास संचालित जन औषधि केंद्र में भी सीमित दवाएं हैं, ऐसे में मरीज निजी मेडिकल स्टोरों की तरफ रुख करते हैं। जो मांग पर हर दवाई उपलब्ध कराते हैं। ऐसे में मेडिकल कॉलेज के बाहर स्टोर की संख्या भी 25 तक पहुंच चुकी है। हालात यह हैं कि मरीज के हाथ में पर्ची देखते ही स्टोर संचालक व कर्मचारी उन्हें आवाज लगाने लग जाते हैं।
मरीज निसिंग निवासी शांति, हरदेव और सतप्रकाश का आरोप है कि डॉक्टर द्वारा लिखी गई अधिकांश दवाएं अस्पताल में नहीं मिलतीं। जन औषधि केंद्र पर भी कई जरूरी दवाओं का स्टॉक नहीं होता। ऐसे में मरीजों को मजबूरी में बाहर मेडिकल स्टोरों से दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। यहां दवाएं अधिकतम खुदरा मूल्य यानी एमआरपी पर बेची जा रही हैं जिससे गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों की जेब पर भारी बोझ पड़ रहा है।
विज्ञापन

शुगर, बीपी और संक्रमण संबंधित दवाएं भी नहीं
कई मरीज ऐसे हैं जिन्हें हार्ट, शुगर, ब्लड प्रेशर और संक्रमण संबंधी दवाएं लंबे समय तक लेनी पड़ती हैं। जब ये दवाएं अस्पताल या जन औषधि केंद्र में नहीं मिलतीं तो बाहर से महंगे दामों पर खरीदना मजबूरी बन जाता है। लोगों का आरोप है कि यदि अस्पताल और जन औषधि केंद्र में पर्याप्त दवाएं उपलब्ध हों तो मरीजों को राहत मिल सकती है और बाहर मेडिकल स्टोरों पर निर्भरता कम होगी। मरीजों ने प्रशासन से मांग की है कि अस्पताल में दवाओं की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित की जाए और जन औषधि केंद्र में स्वीकृत सभी आवश्यक दवाएं उपलब्ध कराई जाएं। कुछ वर्षों में अस्पताल के आसपास मेडिकल स्टोरों की संख्या लगातार बढ़ती गई और अब स्थिति यह है कि हर कुछ दूरी पर नई दुकान दिखाई देती है। मरीजों का कहना है कि सरकारी अस्पताल में इलाज कराने का उद्देश्य खर्च कम करना होता है लेकिन यहां जांच और दवा दोनों पर अलग से पैसा खर्च करना पड़ रहा है।


मरीज बोले-
डॉक्टर ने जो दवाएं लिखीं, उनमें से ज्यादातर अस्पताल में नहीं मिलीं। जन औषधि केंद्र पर गए तो वहां भी दवा खत्म बताई गई। मजबूरी में बाहर मेडिकल स्टोर से पूरी दवा खरीदनी पड़ी।
विज्ञापन

- सुनीता देवी, मरीज परिजन


सरकारी अस्पताल में इलाज सस्ता होना चाहिए लेकिन यहां दवा बाहर से खरीदनी पड़ रही है। मेडिकल स्टोर वाले सीधे एमआरपी पर दवा दे रहे हैं। गरीब आदमी के लिए इलाज महंगा पड़ रहा है।
- राजेश कुमार, मरीज परिजन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें