जिले के एक्यूआई में आंशिक सुधार, 202 से घटकर 194 पर आया
प्रवीण भार्गव
करनाल/जुंडला/चिडाव। भले ही सेटेलाइट निगरानी में वीरवार को करनाल जिले में कोई एक्टिव फायर लोकेशन नहीं मिली है लेकिन शाम होते ही खेतों में कई स्थानों पर पराली जलती दिखाई दी है। ये दीगर बात है कि करनाल का वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) में आंशिक सुधार आया है, 202 से घटकर 194 दर्ज किया गया है। इसके कारण करनाल जिला पूअर श्रेणी से मध्यम श्रेणी में आ गया है।
चिडाव खंड से लगते खेतों में किसान शाम होते ही पराली जलाना शुरू कर देते हैं। क्योंकि दिन के समय प्रशासन की निगरानी रहती है, अधिकारी भी निगरानी करते हैं लेकिन शाम को वह अपने घरों को लौट जाते हैं। अंधेरे में सेटेलाइट निगरानी का भी खतरा कम हो जाता है। इसके बाद खेतों में पराली धधकने लगती है। प्रदूषण कितना बढ़ रहा है, कितने लोगों को इससे परेशानी हो रही है, इससे बेखबर किसानों को गेहूं की बुवाई के लिए अपने खेतों को खाली करने की शीघ्रता है। हालांकि इससे हवा में जहर घुलने से दूसरों को दिक्कत के साथ9साथ उनके अपने खेतों के भी मित्र कीट नष्ट हो रहे हैं। कुल मिलाकर वह अपने ही हाथों से आग लगाकर अपना ही नुकसान कर रहे हैं। फसल अवशेष सर्वोत्तम कंपोस्ट खाद होती है। जिससे किसान अपने खेतों में बेशकीमती पराली में आग लगाकर एक अच्छी खाद से वंचित रह जाता है वहीं, भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने वाले जीवाणुओं को नष्ट हो कर रहा है। संवाद
सकारात्मक भूमिका निभाएं किसान
खंड कृषि अधिकारी कर्मवीर गिरी ने कहा कि किसान पराली न जलाकर फसल अवशेष प्रबंधन कर एक सभ्य नागरिक होने का परिचय देने के साथ साथ सरकार द्वारा फ़सल अवशेष प्रबंधन में अपना सहयोग देकर समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा सकता है।
पराली जलाना कानून अपराध
एसडीओ कृषि विभाग अधिकारी डॉ. राधे श्याम गुप्ता ने कहा कि फसल अवशेष जलाना सामाजिक बुराई ही नहीं, बल्कि कानूनी अपराध भी है। इससे प्रकृति, जमीन तथा मानव जीवन पर अत्यंत गंभीर व प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं, जिससे जमीन की उर्वरा शक्ति नष्ट होने के साथ साथ प्रदूषण की वजह से मनुष्य भी जानलेवा बीमारियों का शिकार हो रहा है। फसल अवशेष प्रबंधन करने वाले किसानों को सरकार की ओर से प्रति एकड़ एक हजार रुपये प्रोत्साहन राशि के रूप में दिए जा रहे हैं।
आंखों में जलन के बढ़ रहे मरीज
स्वास्थ्य विभाग डॉ. आशुतोष मित्तल का कहना है कि किसान फ़सल अवशेषों में आग लगाकर लोगों के लिए भविष्य में कैंसर, दमा इत्यादि जानलेवा बीमारियों को भी सीधा निमंत्रण दे रहे हैं, क्योंकि फ़सल अवशेषों में आग लगाने से आंखों के मरीजों की संख्या में दिन प्रतिदिन इजाफा हो रहा है। पराली जलाकर किसान लोगों के स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण से खिलवाड़ कर रहे हैं।
पराली को खेतों में मिलाएं
प्रगतिशील किसान दीनबंधु शर्मा का कहना है कि किसानों को फसल अवशेषों में आग न लगाकर खेत में ही मिलाना चाहिए। जिसकी भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। किसानों को पराली में आग नहीं लगानी चाहिए। किसानों के खिलाफ मजबूर होकर सरकारी फरमान होने पर आग न लगाकर प्रशासन की ओर से की जाने वाली कार्रवाई से बचें।