संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने स्टार हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंस कंपनी के खिलाफ कड़ा फैसला सुनाते हुए दहा गांव निवासी महिला शिकायतकर्ता शालू के पक्ष में निर्णय दिया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि मरीज को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत है या नहीं, इसका फैसला इलाज करने वाले डॉक्टर का होता है, न कि बीमा कंपनी का।
आयोग के फैसले के अनुसार, दहा गांव निवासी शिकायतकर्ता शालू ने बताया कि उनके पति ने उनके लिए यंग स्टार हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी ली थी, जिसकी बीमा राशि तीन लाख रुपये थी। नवंबर, 2024 में बुखार और संक्रमण के कारण शालू को करनाल के लाइफ केयर अस्पताल में दाखिल करवाया गया। इलाज के दौरान उन्हें 23 नवंबर, 2024 से 27 नवंबर, 2024 तक अस्पताल में रहना पड़ा। उनके इलाज पर अस्पताल में कुल 56 हजार 362 रुपये खर्च आया, लेकिन बीमा कंपनी ने यह कहते हुए क्लेम खारिज कर दिया कि यह इलाज ओपीडी के तौर पर भी हो सकता था। इसके लिए अस्पताल में भर्ती होना अनिवार्य नहीं था।
कंपनी का रवैया अनुचित
आयोग के अध्यक्ष जसवंत सिंह और सदस्यों ने बीमा कंपनियों के रवैये पर नाराजगी जताते हुए कहा कि कंपनियां प्रीमियम लेने में तो रुचि रखती हैं, लेकिन क्लेम देने के समय तकनीकी खामियां निकालकर पीछे हट जाती हैं। आयोग ने माना कि कंपनी का क्लेम खारिज करना पूरी तरह से मनमाना और अनुचित था।
45 दिन में करें भुगतान
आयोग ने शिकायत को स्वीकार करते हुए स्टार हेल्थ इंश्योरेंस को इलाज पर आए खर्च के 50747 रुपये की राशि का भुगतान शिकायतकर्ता को करने के आदेश दिए। इसके अलावा बीमा कंपनी इस राशि पर 27 जनवरी 2025 से भुगतान होने तक नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देगी। कंपनी उपभोक्ता को हुई मानसिक परेशानी के लिए 20 हजार रुपये का हर्जाना और कानूनी कार्रवाई के खर्च के रूप में 11 हजार रुपये अलग से देगी। आयोग ने कंपनी को इस आदेश का पालन करने के लिए 45 दिनों का समय दिया है।