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Karnal News: आयोग ने कहा- बीमा कंपनियां बहाने बनाकर उपभोक्ताओं को करती हैं परेशान

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करनाल। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बीमा कंपनी की मनमानी पर सख्त रुख अपनाते हुए उपभोक्ता के हित में एक बड़ा फैसला सुनाया है। आयोग ने पाया कि बिना ठोस आधार के बीमा क्लेम खारिज करना सेवा में गंभीर कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार है। आयोग ने एसबीआई जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को शिकायतकर्ता को 8.04 लाख रुपये की क्लेम राशि, उस पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज, 25 हजार रुपये मानसिक प्रताड़ना का मुआवजा तथा 11 हजार रुपये मुकदमेबाजी खर्च देने के आदेश दिए हैं। आदेश का पालन करने के लिए कंपनी को 45 दिन का समय दिया गया है। आयोग ने कहा कि बीमा कंपनियां आकर्षक वादे करके पॉलिसियां बेचती हैं, बाद में बहाने बनाकर उपभोक्ताओं को परेशान करती हैं।
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मामले के अनुसार करनाल के सेक्टर-8 निवासी दिलबाग सिंह (54) ने अपनी इनोवा कार का एसबीआई जनरल इंश्योरेंस से 12.40 लाख रुपये की इंश्योर्ड डिक्लेयर वैल्यू यानी आईडीवी पर बीमा कराया था। 20 सितंबर 2024 को लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे पर उनकी कार का हादसा हो गया, जिसमें वाहन को भारी नुकसान पहुंचा। हादसे के तुरंत बाद बीमा कंपनी को सूचना दी गई और वाहन को टोयोटा के अधिकृत शोरूम भेजा गया। शोरूम ने मरम्मत का अनुमानित खर्च करीब 11.71 लाख रुपये बताया। इसके बाद बीमा कंपनी के प्रतिनिधि की सलाह पर वाहन की मरम्मत खालसा मोटर्स में करवाई गई, जहां कुल 8.04 लाख रुपये खर्च हुए।
शिकायतकर्ता ने मरम्मत के बिल सहित सभी आवश्यक दस्तावेज बीमा कंपनी को उपलब्ध करा दिए। इसके बावजूद कंपनी ने 3 दिसंबर 2024 को पत्र जारी कर यह कहते हुए क्लेम अस्वीकार कर दिया कि जरूरी दस्तावेज जमा नहीं कराए गए। बीमा कंपनी का कहना था कि वाहन को 75 प्रतिशत से अधिक नुकसान हुआ था इसलिए यह मामला कंस्ट्रक्टिव टोटल लॉस का बनता है और कंपनी केवल 2.48 लाख रुपये का भुगतान करने को तैयार थी। कंपनी ने इस आधार पर अतिरिक्त दस्तावेज भी मांगे थे।
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कंपनी की दलीलों को किया खारिज
मामले की सुनवाई आयोग के अध्यक्ष जसवंत सिंह तथा सदस्य नीरू अग्रवाल और सर्वजीत कौर की पीठ ने की। आयोग ने अपने आदेश में बीमा कंपनी के रवैये पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि आजकल कई बीमा कंपनियां आकर्षक वादे कर पॉलिसियां तो बेच देती हैं लेकिन क्लेम देने के समय तकनीकी आपत्तियां और बहाने बनाकर उपभोक्ताओं को परेशान करती हैं। आयोग ने यह भी पाया कि बीमा कंपनी अपने दावे के समर्थन में सर्वेयर की रिपोर्ट तक आयोग के समक्ष पेश नहीं कर सकी। ऐसे में यह साबित नहीं हो सका कि वाहन वास्तव में टोटल लॉस की श्रेणी में आता था।
जब गाड़ी ठीक हो गई तो टोटल लॉस कैसे
आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि जब वाहन 8.04 लाख रुपये खर्च कर पूरी तरह मरम्मत होकर उपयोग योग्य हो गया, तब उसे जबरन टोटल लॉस घोषित करना उचित नहीं माना जा सकता। आयोग ने इसे बीमा कंपनी की मनमानी और उपभोक्ता के साथ अनुचित व्यवहार बताया। आयोग ने माना कि बिना पर्याप्त आधार के क्लेम खारिज करना सेवा में गंभीर कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार की श्रेणी में आता है।
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