14 को खेली जाएगी रंगों की होली
संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। होलिका दहन 13 मार्च की रात को होगा और अगले दिन 14 मार्च को रंगों की होली खेली जाएगी। श्री श्याम बाला जी ज्योतिष केंद्र के संचालक पंडित विनोद शास्त्री ने बताया कि हिंदू पंचांग के अनुसार होलिका दहन पूर्णिमा को किया जाता है। फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 13 मार्च सुबह 10 बजकर 35 मिनट से शुरू होकर 14 मार्च को दोपहर 12 बजकर 23 मिनट तक रहेगी। इसके अनुसार होलिका दहन 13 मार्च की रात को ही ठीक रहेगा।
हालांकि इस बार होली पर भद्रा का भी साया बताया जा रहा है। भद्रा में होलिका दहन करना अशुभ माना जाता है। होलिका दहन का समय शाम 6 बजकर 57 मिनट से रात 8 बजकर 14 मिनट तक रहेगा। इस बार होलिका दहन का शुभ मुहूर्त एक घंटा चार मिनट है।
पंडित विनोद ने बताया कि क्योंकि भद्रा शुभ कामों में विघ्न डालने का कार्य करती है। इसलिए जब धरती पर भद्रा का वास होता है तो इन कामों का त्याग करना चाहिए। होलिका दहन पर पूर्णिमा तिथि के साथ ही भद्रा की भी शुरुआत हो जाएगी जोकि रात 10 बजकर 36 मिनट तक रहेगी। इसलिए भद्रा खत्म होने के बाद ही होलिका दहन रात 10 बजकर 35 मिनट से 11 बजकर 26 मिनट तक का समय शुभ बताया गया है। ऐसे में होलिका दहन देर रात किया जाएगा और इसके लिए लगभग एक घंटा नौ मिनट का ही शुभ समय मिलेगा।
दहन के दिन भद्रा पूंछ शाम छह बजकर 57 मिनट और आठ बजकर एक मिनट तक दहन करना शुभ माना गया है। वहीं रंगों की होली 14 मार्च की सुबह खेली जाएगी। 14 मार्च को होली की पूर्णिमा तिथि का स्नान दान आदि धार्मिक कार्य किए जाएंगे। जबकि पूर्णिमा का व्रत 13 मार्च को ही रखा जाएगा। जो लोग व्रत करते हैं वे 13 मार्च को ही चंद्रमा को अर्घ्य देंगे। अगली सुबह स्नान और दान करेंगे। पूर्णिमा के दिन सत्यनारायण भगवान की पूजा और कथा जरूर सुनें।
स्नान के बाद करें दान और तर्पण
फाल्गुन पूर्णिमा के स्नान के बाद दान करें और अपने पितरों का तर्पण करें। वसंत पंचमी के आते ही प्रकृति में एक नवीन परिवर्तन आने लगता है। दिन छोटे होते जाते हैं और ठंड कम होने लगती है, पतझड़ शुरू हो जाता है। पंडित विनोद ने बताया कि भगवान शंकर ने अपनी क्रोध अग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था, तभी से इस त्योहार का प्रचलन है। भारत के कई प्रदेशों में होलाष्टक शुरू होने पर एक पेड़ की शाखा काटकर उसमें रंग-बिरंगे कपड़ों के टुकड़े बांधते हैं। इसे जमीन में गाढ़ दिया जाता है और इसके नीचे होली का उत्सव मनाया जाता है, तीसरा यह त्योहार हिरण्यकश्यप की बहन की समृद्धि में भी मनाया जाता है।
कहा जाता है कि हिरण्यकश्यप की बहन होलिका वरदान के प्रभाव से नित्य प्रति अग्नि स्नान करती थी मगर वह जलती नहीं थी। हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन से प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि स्नान करने को कहा। उसने समझा था कि ऐसा करने से प्रहलाद जल जाएगा तथा होलिका बच जाएगी। हिरण्यकश्यप की बहन ने ऐसा ही किया परंतु होलिका तो जल गई, प्रहलाद बच गए। तभी से इस त्योहार को मनाने की प्रथा चल पड़ी।