संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। कॉलोनियों, गांवों व शहर में घूम रहे बेसहारा कुत्ते हर माह औसतन 500 से 550 लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं। पिछले साल 6,391 लोगों को कुत्तों ने काटा था। यह तो केवल वह आंकड़ा है जिन्होंने कुत्ता काटने के बाद स्वास्थ्य विभाग से वैक्सीन लगवाई है। प्राइवेट अस्पतालों में उपचार कराने वालों की संख्या अलग से है।
दरअसल एक दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने लावारिस कुत्तों की समस्या को गंभीर मानते हुए उन्हें शेल्टर होम में रखने के आदेश दिए हैं। इस तरह से हर रोज 16 से 20 लोगों को कुत्तों ने काटा है। ऐसे में यह समस्या विकराल है। शहर में आखिरी बार 2015 में 16170 कुत्तों की नसबंदी की गई थी, जिस पर 1.42 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। जानकारों की माने तो शहरी क्षेत्र में ही बेसहारा कुत्तों की संख्या 40 हजार से अधिक बताई जा रही है।
वहीं नगर पालिका रादौर व साढौरा ने भी अभी तक कुत्तों की नसबंदी को लेकर कोई काम नहीं किया। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश से लोगों को उम्मीद की किरण नजर आई है कि जल्द ही उन्हें बेसहारा कुत्तों के आतंक से निजात मिल सकती है।
2015 में नगर निगम ने एक कुत्ते की नसबंदी करने की एवज में 880 रुपये का भुगतान एजेंसी को किया था। निगम अधिकारियों ने नसबंदी का काम यूपी के अलीगढ़ स्थित तिरुपति फाउंडेशन एनजीओ से कराया था। ऐसे में उस दौरान हुई नसबंदी पर भी सवाल उठ रहे हैं। जब कुत्तों की नसबंदी हुई थी तो अब इनकी संख्या कई गुना कैसे बढ़ गई।
कुत्तों से छुटकारा दिलाने संबंधित शिकायतें लगातार नगर निगम कार्यालय में अधिकारियों के पास आ रही हैं, परंतु समाधान कोई नहीं हो रहा है। यहां तक की जिस मुकंद लाल जिला नागरिक अस्पताल में रैबीज से बचाव की वैक्सीन लगाई जाती है वहां पर भी बेसहारा कुत्तों ने अपना स्थायी डेरा जमा लिया है।
कुत्ते न केवल अस्पताल परिसर में बल्कि सेंट्रल एसी की हवा लेने के लिए मरीजों के बीच में भी बैठे रहते हैं। मार्च महीने में जिला नागरिक अस्पताल में भर्ती अपने पति से मिलने पहुंची खजूरी गांव निवासी मंगती पर वहां घूम रहे बेसहारा कुत्ते ने हमला कर दिया था। कुत्ते ने उनकी टांग पर काट लिया। लोगों ने उन्हें उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया
शहर में कुत्तों की नसबंदी कराने का मामला इसी साल जनवरी से केवल निविदा में ही उलझा है। टेंडर अब तक सिरे नहीं चढ़ सका। एक दिन पहले सोमवार को ही नगर निगम सदन की बैठक में भी कुत्तों की नसबंदी का मामला पार्षदों ने जोर शोर से उठाया था। जिसमें अधिकारियों ने पार्षदों को बताया था कि कुत्तों की नसबंदी के लिए टेंडर लगाया था। केवल एक ही फर्म ने टेंडर के लिए आवेदन किया था। अब दोबारा से टेंडर लगाने की तैयारी है।
मादा कुत्ता साल में दो बार देती है बच्चे
एक मादा कुत्ता साल में दो बार बच्चे देती है। मादा साल में औसतन 10 से 12 बच्चों को जन्म देती है। विशेषज्ञों के अनुसार इनमें से 40 प्रतिशत बच्चों की मृत्यु जन्म के कुछ दिन बाद ही हो जाती है। ऐसे में छह बच्चे ही जीवित रह पाते हैं। जितने कुत्ते बचते हैं उनमें 20 से 30 प्रतिशत मादा होती हैं। डेढ़ से दो साल बाद ये खुद बच्चे पैदा करने में सक्षम हो जाते हैं। ऐसे में बड़ा सवाल उठ रहा है कि जब 16 हजार से अधिक कुत्तों की नसबंदी कराई गई थी तो शहर में अब इनकी संख्या इतनी कैसे बढ़ गई।
बच्चों का स्कूल जाना भी हो गया है मुश्किल
सेक्टर-17 के कुछ लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उनके बच्चे निजी स्कूल में जाते हैं। कुछ लोग सेक्टर में आकर बेसहारा कुत्तों को गली के बीचोबीच चिकन बेसड फूड खिलाते हैं। यह बाजार से मिलता है। इसमें चिकन के अवशेष मिले होते हैं। जब कुत्तों को वह भोजन नहीं मिलता तो वह स्कूल जाने वाले बच्चों के पीछे दौड़ते हैं। इस बारे में उन्होंने भोजन खिलाने वाले लोगों को बोला भी था, लेकिन उल्टा उन्हें ही भला बुरा कहा जाने लगा। काफी लोग ऐसे भी हैं जो कुत्तों को दूध भी पिलाते हैं।
चिकन की दुकानों के पास कुत्तों का झुंड
शहर की रिहायशी कॉलोनियों के अंदर व सड़कों किनारे जगह-जगह चिकन की दुकानें खुल गई हैं। दिनभर का काम खत्म होने के बाद दुकानदार मांस व चिकन के अवशेष आसपास सड़क किनारे या फिर खाली प्लॉटों में फेंक देते हैं। कुत्ते इन अवशेषों को खाने के लिए दूर से ही दौड़े आते हैं। जब कुत्तों को खाने को मांस व अवशेष नहीं मिलता तो वह लोगों के पीछे दौड़ते हैं। मांस के इंतजार में कुत्ते सारा दिन इन चिकन की दुकानों के आसपास झुंड में बैठे रहते हैं।
कुत्तों के डर से सुबह-शाम की सैर करने वालों लोगों की संख्या हुई कम
सेक्टर-17 निवासी सीनियर सिटीजन राजपाल व बृजपाल ने बताया कि हालात ऐसे हो गए हैं कि लोगों ने कुत्तों के डर से सुबह-शाम की सैर भी कम कर दी है। यदि कोई सैर पर जाता है लोगों को अपने हाथ में डंडा रखना पड़ता है। लोगों को हर समय डर लगा रहता है कि पता नहीं कब कहां से आकर कुत्ता उन पर हमला न कर दे। गली में यदि कोई कूड़ा बीनने वाला आता है तो आठ से दस कुत्ते उसके पीछे लग जाते हैं।
नगर निगम ने कुत्तों की नसबंदी को लेकर टेंडर लगाया था। केवल एक ही फर्म ने टेंडर के लिए आवेदन किया था। सिंगल बिड आने पर एजेंसी को वर्क अलॉट नहीं कर सकते। इअब दोबारा टेंडर लगाया जाएगा। प्रयास यही है कि जल्द से जल्द कुत्तों की बढ़ती संख्या पर अंकुश लगाया जाए।
-अखिल पिलानी, आयुक्त, नगर निगम यमुनानगर।
सिविल अस्पताल के मुख्य गेट पर घूमते बेसहारा कुत्ते। संवाद
सिविल अस्पताल के मुख्य गेट पर घूमते बेसहारा कुत्ते। संवाद