जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बीमा क्षेत्र में ग्राहकों के हितों की रक्षा करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। आयोग ने स्टार हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंस कंपनी को आदेश दिया है कि वह शिकायतकर्ता रोहित कुमार के इलाज का पूरा खर्च अदा करे जिसे कंपनी ने पॉलिसी ब्रेक और दस्तावेज में विसंगति का हवाला देकर खारिज कर दिया था। इसके साथ ही मानसिक परेशानी और उत्पीड़न के लिए 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है।
सेक्टर-13 अर्बन एस्टेट निवासी रोहित कुमार वर्ष 2016 से लगातार स्टार हेल्थ की पॉलिसी ले रहे थे। 25 नवंबर, 2024 में उन्हें पीठ दर्द (4 डिस्क की समस्या) के कारण गुरुग्राम के एक निजी अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, वहां उनके इलाज पर लगभग दो लाख 75 हजार 329 रुपये का खर्च आया। बीमा कंपनी ने उनके दावे को यह कहकर खारिज कर दिया कि पॉलिसी 29 अक्तूबर, 2024 को खत्म हो गई थी और 5 नवंबर, 2024 को रिन्यू हुई। यानि की पॉलिसी होने में 6-10 दिनों का गैप था। इसके अलावा बीमा कंपनी का तर्क था कि अस्पताल के रिकॉर्ड में एक जगह दर्द की अवधि 25 दिन और दूसरी जगह 15 दिन लिखी थी।
कंपनी के अनुसार, बीमारी उस ब्रेक पीरियड के दौरान शुरू हुई थी, इसलिए वे भुगतान के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। शिकायतकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि रोहित कुमार वर्ष 2016 से ग्राहक हैं और रिकॉर्ड में 15 या 25 दिन का अंतर केवल एक टाइपोग्राफिकल (लिखने की) गलती हो सकती है। इस पर सुनवाई करते हुए आयोग के अध्यक्ष जसवंत सिंह और सदस्यों ने पाया कि बीमा कंपनी केवल तकनीकी आधार पर एक पुराने और ईमानदार ग्राहक का दावा खारिज नहीं कर सकती।
मानसिक परेशानी के लिए देने होंगे 50 हजार रुपये
आयोग ने माना कि दावे को अवैध और गैरकानूनी तरीके से ठुकराना सेवा में कमी माना गया है। उपभोक्ता अदालत ने बीमा कंपनी को इलाज पर आया दो लाख 75 हजार 329 रुपये का अस्पताल खर्च, सात हजार रुपये का एमआरआई और अन्य खर्च के साथ यह राशि 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से वहन करने के आदेश दिए। इसके अलावा उपभोक्ता को हुई मानसिक परेशानी और उत्पीड़न के लिए 50 हजार रुपये देने के आदेश दिए। यह फैसला उन बीमा धारकों के लिए बड़ी राहत है जिनके दावों को कंपनियां अक्सर मामूली दस्तावेजी त्रुटियों या पॉलिसी रिन्यूअल में कुछ दिनों की देरी का बहाना बनाकर रद्द कर देती हैं।