संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने केयर हेल्थ इंश्योरेंस लिमिटेड को फटकार लगाते हुए उपभोक्ता को दो लाख 56 हजार 323 रुपये जुर्माना देने के आदेश दिए हैं। इसमें इलाज पर खर्च राशि दो लाख 20 हजार 323 रुपये शामिल है। यह राशि क्लेम की अस्वीकृति यानि 3 मई, 2023 ये भुगतान तक नौ प्रतिशत ब्याज के साथ अदा करनी होगी। आयोग ने बीमा कंपनी को सेवा में कमी और अनुचित व्यापार प्रथाओं का दोषी माना है। आयोग ने कहा कि बीमा कंपनी का क्लेम अस्वीकार करना मनमाना और अनुचित है।
शिकायतकर्ता गीता रानी ने जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग को शिकायत दी थी कि उनके पति अनिल कुमार ने केयर हेल्थ इंश्योरेंस लिमिटेड (पूर्व में रेलिगेयर हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड) से स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी ली थी। पॉलिसी समय-समय पर नवीनीकृत होती रही। पॉलिसी 28 अगस्त, 2022 से 27 अगस्त, 2023 तक वैध थी। फरवरी, 2023 में उनके पति अनिल कुमार को पेट की समस्या हुई। उन्हें करनाल के एक निजी अस्पताल में दाखिल करवाया गया। जहां उन्हें विघटित सिरोसिस (हेपेटाइटिस सी से संबंधित) पीलिया पाया गया। उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ और उन्हें पीजीआई रोहतक रेफर किया गया। जहां 2 मार्च 2023 को उनका निधन हो गया। उनके इलाज पर कुल दो लाख 20 हजार 323 रुपये खर्च आया।
शिकायतकर्ता ने बीमा कंपनी के पास क्लेम आवेदन जमा किया, लेकिन कंपनी ने तीन मई 2023 को क्लेम अस्वीकार कर दिया था। आयोग के समक्ष कंपनी का तर्क था कि अनिल कुमार को शराब से संबंधित क्रॉनिक लिवर डिजीज थी, जिसका खुलासा उन्होंने पॉलिसी लेते समय नहीं किया था। इसलिए उनके क्लेम को अस्वीकार किया गया है। आयोग ने पाया कि बीमा कंपनी यह साबित करने में पूरी तरह विफल रही कि अनिल कुमार पॉलिसी खरीदते समय किसी भी तरह के क्रॉनिक लिवर डिजीज के लिए उपचार करा रहे थे या इस बीमारी से पीड़ित थे। अस्पताल की डिस्चार्ज समरी से भी इसकी पुष्टी नहीं हो पाई। दोनों पक्षों की सुनने के बाद आयोग ने माना कि शिकायतकर्ता पॉलिसी की कुल बीमित राशि सात लाख 35 हजार 420 के लिए नहीं, बल्कि इलाज पर खर्च की गई वास्तविक राशि के लिए हकदार हैं। क्योंकि यह एक स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी थी, न कि जीवन बीमा पॉलिसी थी।
आयोग ने फैसला सुनाया कि केयर हेल्थ इंश्योरेंस लिमिटेड उपभोक्ता को दो लाख 20 हज़ार 323 रुपये इलाज खर्च देगी। यह राशि 3 मई, 2023 से भुगतान होने तक नौ प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज के साथ वहन करनी होगी। इसके अलावा मानसिक पीड़ा और उत्पीड़न के लिए 25 हजार रुपये मुआवजा और 11 हजार रुपये की राशि मुकदमे के खर्च के रूप में देनी होगी। कंपनी को यह राशि 45 दिन के भीतर देनी है।