क्रांतिकारी संत मुनि तरुण सागर महाराज ने कहा कि किसी भी काम को करने से पहले यह मत बोलो कि मन नहीं है? यदि मनुष्य का लक्ष्य पवित्र हो, इरादा नेक हो तो बिना पीछे देखे अपने लक्ष्य की ओर ही देखना चाहिए। मनुष्य को यदि ऊंचाई को हासिल करना है तो मन पर विजय पाना बहुत जरूरी है। मुनिश्री तरुण सागर महाराज नई अनाज मंडी में एसएस जैन सभा की ओर से आयोजित कार्यक्रम में प्रवचन कर रहे थे।
कार्यक्रम में नीलोखेड़ी के विधायक भगवान दास कबीरपंथी, घरौंडा के विधायक हरविंद्र कल्याण और असंध के विधायक बख्शीश सिंह विर्क ने मुख्य तौर पर शिरकत की और कहा कि हमें संतों के दिखाए मार्ग पर चलना चाहिए और जीवन की महत्वपूर्ण बातों को हमेशा याद रखना चाहिए। मुनि तरुण सागर जी ने कहा कि दुनिया में तीन चीजें मुश्किल हैं। पहला हाथी को धक्का देना, मच्छर की मालिश और शादी के बाद मुस्कुराना। अगर आदमी हर हाल में जीने की आदत डाल ले तो वह शादी क्या, ताउम्र मुस्कुराते हुए जी सकता है। उन्होंने कहा कि दो बातें याद रखिये और दो बातों को भूल जाइए। याद रखने वाली बात अपने भगवान और मौत को याद रखिए और भूल जाने वाली बात-किसी ने तुम्हारे से कुछ बुरा किया या तुमने कोई अच्छा काम किया। इस मौके पर पूर्व विधायक ओमप्रकाश जैन, जैन सभा के प्रधान राजिंद्र जैन, सुशील जैन, महेंद्र, विनोद, रामभज, पुरुषोत्तम, मदनलाल, देवी सिंह, लाजपत राय आदि मौजूद रहे।
कोई आपकाे कुत्ता कहे तो भौंकें नहीं
महाराज ने कहा कि सांसारिक वस्तुएं टेढ़ी हो सकती हैं, लेकिन संसार बनाने वाला टेढ़ा नहीं हो सकता। इंसान टेढ़ा है, लेकिन उसका मन टेढ़ा नही है। जीवन का गणित बहुत उल्टा है। जन्म को सुधारो तो मृत्यु सुधरती है। उन्होंने कहा कि यदि आपको कोई कुत्ता कहता है तो आप उसे भौंके नहीं, बल्कि मुस्कुराएं। गलियां देने वाला स्वयं ही शर्मिंदा हो जाएगा। अन्यथा सचमुच कुत्ता बन जाओगे। यदि कोई आपको गालियां देता है और आप उसे स्वीकार नहीं करते तो वह गालियां उसी के पास रह जाती हैं। उन्होंने कहा कि शादी करना है तो जागते हुए करो। परिजनों की मर्जी को दरकिनार कर घर से भागने की प्रवृति आपके जीवन को अंधकारमय बना सकती है।
उन्होंने कहा कि युवतियां कभी भी घर से भागकर शादी मत करना। विधर्मी से शादी करने पर आपको वह सब भी करना पड़ सकता है, जिसकी कल्पना आपने कभी न की होगी। तीन घंटे की फिल्म और वास्तविक जीवन में काफी अंतर होता है। इसलिए जागृत अवस्था में रहकर ही कोई भी कार्य करो। महाराज ने कहा कि बुढ़ापा जीवन का अंतिम पड़ाव है। अगर आप अपने बुढ़ापे को सुखी बनाना है तो भले ही अपने बच्चों को कार न दें, पर उन्हें संस्कार जरूर दे। संस्कारों से ही परिवार, समाज व देश ऊंचा उठता है।