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Karnal News: अंतिम संस्कार के बाद अस्थियों का संचय नहीं करते पूजम के ग्रामीण

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- महाभारत काल से जुड़ा है इस गांव का इतिहास, यहां शिव मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग है स्थापित
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गौतम जोशी

नीलोखेड़ी। पूजम गांव का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है, यहां के प्राचीन शिव मंदिर में स्थापित स्वयंभू शिवलिंग पर जलाभिषेक करने वाले श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है। बताते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पूजा कराए जाने के कारण इस भूमि को इतना पवित्र माना जाता है कि यहां के लोग किसी मृत व्यक्ति के अंतिम संस्कार के बाद आज भी उसकी अस्थियों का संचय नहीं करते हैं।
यह गांव कर्मभूमि कुरुक्षेत्र के 12 कोस में होने के कारण महाभारत काल का इतिहास संजोए हुए है। किसी मृत व्यक्ति के अंतिम संस्कार के बाद उसकी अस्थियां संचय नहीं करने के पीछे लोगों का मानना है कि श्रीकृष्ण जी द्वारा यहीं पर कौरवों-पांडवों द्वारा पूजा करवाए जाने से यह जगह पवित्र है। मंदिर में सेवा कर रहे गुरु जयराम दास ने बताया कि महाभारत युद्ध आरंभ होने से पहले श्रीकृष्ण जी ने कौरवों और पांडवों को एक साथ बैठाकर इसी स्थान पर मां दुर्गा शक्ति और अस्त्र-शस्त्र की पूजा करने का सुझाव दिया था। श्रीकृष्ण जी ने भविष्यघोष किया था कि पूजा-अर्चना के बाद मां दुर्गा शक्ति दोनों युधिष्ठर अथवा दुर्योधन में जिसको भी विजय वरदान देगी, विजय रूपी पुष्प उसी की अंजलि में गिरेगा। जिसके बाद दोनों पक्षों (कौरवों और पांडवों ) द्वारा पूजा अर्चना आरंभ हुई।
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मंत्रोच्चारण के बीच ‘अहम पूज्यामि’ और पूजा की पूर्ण आहुति डालते ही पुष्प युधिष्ठर की अंजलि में गिर गया था। कहा जाता है कि इसी ‘पूज्यामि’ शब्द का बदला रूप पूजम बनकर प्रसिद्ध हुआ। इस स्थान पर आबाद हुई बस्ती को पूजम नाम से जाना जाने लगा। गांव की पश्चिम में द्वापर युग में एक सरोवर के रूप में था, जो कालांतर में खंडित हो गया। इस सरोवर के साथ ही एक भव्य शिवालय भी है। जिसमें स्वयंभू शिवलिंग प्रकट रूप में दिखते हैं।

एक धारणा यह भी है कि निकटवर्ती गांव सीधुपर के एक बनिए की यहां कृषि भूमि थी। एकबार काम करते समय जब उसने इस ‘स्वयंभू शिवलिंग’ को देखा तो एक पत्थर समझकर इसे बाहर निकालने की कोशिश की। जिसके चलते वह कुल्हाड़ी, कुदाल अथवा फावड़े से हर रोज जितनी खुदाई करके जाता अगले दिन सुबह आने पर शिवलिंग वापिस उसी रूप और स्थिति में मिलता था। इस शिवलिंग पर आज भी वही निशान भी विद्यमान हैं। बनिए द्वारा कई दिन तक प्रयास करने के बाद एक रात उसे सपना आया और स्वयंभू शिवलिंग के बारे में बताते हुए वहां मंदिर बनाने की बात कही। जिससे प्रभावित होकर बनिए ने इसी स्थान पर मंदिर बनाया तथा अपनी चार एकड़ कृषि भूमि भी मंदिर ने नाम दान दे दी।
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सरपंच जॉनी शर्मा ने बताया कि इस प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर में कई दशकों तक सेवा करने वाले बाबा रामगिरि जी ने लोगों के सहयोग से मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए बहुत काम किया था। खंडित हो चुके सरोवर को अब ग्राम पंचायत ने जीर्णोद्धार करके एक भव्य सरोवर का रूप दे दिया है। उन्होंने बताया कि हर वर्ष वैशाख की दूज तिथि को बाबा रामगिरि की स्मृति में मेले का आयोजन तथा भंडारा लगाया जाता है।
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