संवाद न्यूज एजेंसी
इंद्री। कारगिल युद्ध में बलिदान हुए राइफलमैन प्रवेश कुमार की शहादत युवाओं के लिए प्रेरणा है। घर में उनकी शादी की तैयारियां चल रही थी, तीन महीने बाद शादी होनी थी लेकिन इसी दौरान उनके बलिदान होने की खबर ने शादी की खुशियों को पलभर में खत्म कर दिया।
इंद्री क्षेत्र के मुखाला गांव के जाबांज प्रवेश कुमार को अपने दादा महावीर सिंह से फौज में जाने की प्रेरणा मिली थी। उनके दादा ने भी सेना में रहकर सरहद की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर कर दिए थे। दादा महावीर सिंह 1971 की लड़ाई में बलिदान हुए थे। परिवार को उनका पार्थिव शरीर भी प्राप्त नहीं हुआ था। छह फरवरी 1978 को जन्मे प्रवेश कुमार 10वीं उत्तीर्ण करते ही सेना में भर्ती हो गए थे। वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान 6 जून को उन्होंने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनके पैतृक गांव मुखाला में उनकी वीरता के सम्मान में एक प्रतिमा स्थापित की गई है। इसके अलावा, सरकार ने उनके नाम से एक लाइब्रेरी का भवन भी बनवाया था। अफसोस की बात ये है कि 25 वर्ष बीत जाने के बाद भी इस लाइब्रेरी में पुस्तकों का इंतजाम नहीं हो पाया है।
प्रवेश कुमार के नाम पर बनाई गई लाइब्रेरी का भवन देखरेख के अभाव में जीर्णशीर्ण होने लगा। ग्रामीणों ने उसके बाहर व आसपास अपने पशु बांधने शुरू कर दिए। अब ये लाइब्रेरी किसी पशुशाला जैसी लगने लगी है। यहां सफाई व्यवस्था न के बराबर है।
लाइब्रेरी के भवन का निर्माण हुआ था : सरपंच : मुखाला ग्राम पंचायत के सरपंच ओमबीर ने बताया कि वर्ष 2000 के आसपास लाइब्रेरी के भवन का निर्माण हुआ था, हालांकि किताबें अभी तक नहीं आई हैं। उपायुक्त ने कस्बे में बनी लाइब्रेरियों के रखरखाव को लेकर संज्ञान लिया गया था और उसी के अनुसार लाइब्रेरी की आंतरिक संरचना का कुछ कार्य करवाया गया है, किताबें आते ही लाइब्रेरी को लोगों के लिए खोल दिया जाएगा।