आजकल बदले हुए सामाजिक रिश्तों, तेज रफ्तार जीवन और भावनात्मक असुरक्षा के कारण कई लोग दोबारा किसी पर भरोसा करने में डर महसूस कर रहे हैं। रिश्तों में टूटन, धोखे और दुखद अनुभवों ने मानसिक स्थिति पर गहरा असर डालना शुरू कर दिया है। किसी पर भरोसा करने से अत्यधिक डर लगना पिस्टैंथ्रोफोबिया फोबिया कहा जाता है
जिला नागरिक अस्पताल की मनोरोग ओपीडी में हर दिन लगभग 150 मरीज मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मामलों को लेकर ओपीडी में आ रहे हैं। इनमें पिस्टैंथ्रोफोबिया फोबिया के मरीज भी होते हैं। युवा वर्ग और 25 से 40 वर्ष आयु के लोग इसकी चपेट में अधिक दिखाई दे रहे हैं। हर दिन ऐसे 15 से 20 केस आ रहे हैं। क्योंकि यह वही आयु है जब व्यक्ति रिश्तों और कॅरिअर दोनों के दबाव से गुजरता है। पिछले रिश्तों में मिला धोखा, परिवार में चला आ रहा तनाव, बचपन में असुरक्षित माहौल और किसी अपने का मानसिक शोषण इस डर के मुख्य कारण हैं। ऐसे अनुभव व्यक्ति के मन में गहरी छाप छोड़ देते हैं और धीरे-धीरे दिमाग दूसरों को खतरे की तरह देखने लगता है।
- लक्षण
नए लोगों पर भरोसा करने में झिझक या डर। किसी रिश्ते में बढ़ती नजदीकी से बेचैनी। बार-बार शक करना या नकारात्मक सोच का बढ़ना। निजी बातें साझा करने में असुरक्षा। पुराने अनुभवों को बार-बार याद कर डर महसूस करना। रिश्तों में दूरी बनाना या लोगों से कट जाना।
- बचाव
भरोसे से जुड़े छोटे-छोटे कदम उठाएं। सुरक्षित वातावरण में धीरे-धीरे लोगों से जुड़ना शुरू करें। नकारात्मक अनुभवों को मन में दबाकर न रखें। तनाव घटाने वाली तकनीक जैसे गहरी सांस लेने पर काम करें। ध्यान या काउंसिलिंग अपनाएं। भरोसेमंद लोगों से खुलकर बातचीत करें।
भरोसा टूटने के बाद दिमाग स्वयं को बचाने के लिए और चौकन्ना हो जाता है। ऐसे में तनाव रसायन बढ़ जाते हैं और व्यक्ति हर नए संबंध को खतरे की तरह देखने लगता है। यह स्थिति यदि समय पर संभाली न जाए तो पिस्टैंथ्रोफोबिया गंभीर रूप ले सकता है। काउंसिलिंग और सही उपचार से लोग फिर से सामान्य जीवन और रिश्तों को स्वीकार करना सीख सकते हैं। -डॉ. सौभाग्य कौशिक, मनोरोग विशेषज्ञ, जिला नागरिक अस्पताल