करनाल। डंकी रूट से अमेरिका जाने वाले युवाओं की जान जोखिम में ही रहती है। अमेरिका से डिपोर्ट होकर लौटे युवाओं ने बताया कि पैनामा के जंगलों में उन्हें कई-कई दिनों तक भूखे रहकर मीलों का सफर तय करना पड़ता है। कठिन मार्ग में चोट लगने और बीमारी के कारण युवाओं की जान तक चली जाती है।
कई किलोमीटर तक डोंकरों का एक साथी आगे चलता रहता है। उसके पीछे-पीछे युवाओं का समूह दौड़ता है। शरीर कमजोर होने के कारण युवा थक भी जाते हैं लेकिन उन्हें कहीं बैठकर आराम तक नहीं करने दिया जाता। डंकी मार्ग का दर्द बयान करते हुए युवाओं ने बताया कि पैनामा के जंगलों में कोई किसी का साथी नहीं है। हर कोई अपने समूह के साथ ही आगे बढ़ता है। क्योंकि किसी को आगे का रास्ता नहीं पता। जहां-जहां डोंकर चलता है, उसके पीछे जाना होता है। यदि कोई थककर रुक जाए तो आगे जाने की जिम्मेदारी उसकी ही है, वह भागकर भी समूह तक नहीं पहुंच पाता। यदि एक बार रास्ता भटक गए तो जंगलों में गुम हो जाएंगे। कई बार युवाओं की दर्द भरे सफर में मौत भी हो जाती है, इनके परिवारों तक भी इसकी सूचना नहीं पहुंचती।
रास्ते में युवक की हो गई थी मौत
डिपोर्ट होकर आए रवि ने बताया कि डोंकर खाने व पीने के लिए तो देते हैं लेकिन उनकी अन्य जरूरतों और थकान व चोटिल होने की चिंता नहीं करते। रास्ते में चोट लगने पर पैनामा में कोई मर जाए तो कोई पूछता भी नहीं। यहां एक लड़के की मौत भी हो गई थी, डोंकरों ने यह भी चेक नहीं किया कि युवक जीवित भी है या नहीं। सब उसे छोड़कर आगे भाग गए।
रुकने पर अभद्रता करते हैं डोंकर
डिपोर्ट होकर आए आकाश ने बताया कि रास्ते में डोंकर तेज चलते हैं, उनके पीछे-पीछे ही चलना होता है। कमजोर लड़कियां उनका पीछा नहीं कर पातीं। एक बार जाते समय साथी युवती पीछे छूट गई। जब डोंकर को किसी ने बताया तो वह केवल दो मिनट के लिए रुका, उसका साथी पीछे गया और युवती को धमकाकर तेज चलाते हुए आगे लाया। जब युवती आगे पहुंची तो उसकी सांस चढ़ी हुई थी। रो भी रही थी। पूछने पर पता चला कि रास्ते में अभद्रता भी की गई।
लगा जैसे मौत नजदीक हो
युवक मनीष ने बताया कि पैनामा का जंगल पार करने के बाद उन्हें एक शिविर में रखा गया था। इसके बाद आगे नदी पार करनी थी, जिसमें मगरमच्छ भी थे। यहां छोटी बोट से ले जाया गया। मगरमच्छ बिल्कुल पास में चलते देख ऐसा लगा जैसे मौत नजदीक हो। बोट का चालक भी गलत तरीके से चला रहा था। करीब 7 घंटे के इस सफर के बाद सभी ने राहत की सांस ली। इसके बाद करीब 8 घंटे तक फिर पैदल चलाया गया।