- होली पर्व मनाने के तौर-तरीकों में आए बदलाव के संदर्भ में बुजुर्गों ने साझा किए अनुभव
संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, प्रेम और सद्भाव का प्रतीक है। यह हमारी संस्कृति का परिचायक भी है। आज इस पर्व को मनाने के तरीके बदलते जा रहे हैं। बुजुर्गों ने बताया कि पहले होली की तैयारियां हफ्तों पहले शुरू हो जाती थी।
घरों में पकवान बनते थे। होलिका दहन से पहले लकड़ियां और उपले इकट्ठे किए जाते थे। रंगोत्सव पर ढोलक की थाप पर फाग गाए जाते थे और पूरा मुहल्ला एक परिवार की तरह जश्न मनाता था। बुजुर्गों का कहना है कि होली को सही मायनों में मनाने के लिए प्राकृतिक रंगों का उपयोग करना चाहिए। पानी की बर्बादी नहीं होनी चाहिए।
फूलों से बनाते थे रंग
कृष्णा राम ने बताया कि पहले होली के त्योहार के लिए सभी लोग मिलकर कई दिन पहले ही टेसू के फूलों से रंग बनाते थे, जो स्वास्थ्य को किसी भी प्रकार से हानि नहीं पहुंचाते थे। होली प्रेम और भाईचारे का पर्व था, लेकिन आज भाईचारा कम नफरत अधिक दिखाई देती है।
युवाओं में खत्म हो रहे संस्कार
सोमबीर ने बताया कि पहले लोग बुजुर्गों का सम्मान करते थे। त्योहार के दिन की शुरुआत ही बड़ों के आशीर्वाद से करते थे, लेकिन आज के दौर में यह संस्कार युवाओं में खत्म हो गए हैं। होली के दिन शोर-शराबा, नशा करके तेज आवाज में डीजे बजाना चिंता का विषय है।
घर में कम ही बनते हैं पकवान
शीला देवी ने बताया कि पहले लड़कियां और महिलाएं हफ्तों पहले होली की तैयारी में जुट जाती थीं। घर में ही गुजिया, मालपुए और तरह-तरह की मिठाइयां बनाई जाती थीं। हर घर में एक-दूसरे को मिठाइयां भिजवाई जाती थी। यह परंपरा आज की होली में कम हो गई है। घरों में पकवान बनाने के बजाए लोग दुकान से मिठाई खरीदते हैं।
सोशल मीडिया ने बदली परंपरा
रोशन लाल कहते हैं कि गांव की होली सबसे अनोखी होती थी। पूरे गांव में फाग के गीत गाए जाते थे जिसमें लोग ढोलक और झांझ की धुन पर थिरकते थे। उनके गांव में घर-घर जाकर एक-दूसरे को रंग लगाने की परंपरा थी, लेकिन आज की पीढ़ी सोशल मीडिया के जमाने में दूर बैठे ही बधाई दे देती है।