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Karnal News: अब भाइयों की कलाई पर सजेगी गोमय से बनी राखियां

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अब भाइयों की कलाई पर सजेगी गोमय से बनी राखियां
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एनडीआरआई ने निकरा परियोजना के तहत गाय के गोबर से तैयार की राखियां, पर्यावरण को नहीं पहुंचाएंगी नुकसान
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माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। अब भाइयों की कलाई पर गोमय से बनी राखियां सजेगी। एनडीआरआई ने देसी गाय के गोबर और मिट्टी के मिश्रण से ये राखियां तैयार की हैं। इन राखियों की खूबी ये है कि इनसे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा, वहीं इसे महिलाएं स्टार्टअप के रूप में लेकर आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम बढ़ा सकती हैं। इसके लिए संस्थान के वैज्ञानिकों ने महिलाओं को गोमय राखियां बनाने का विशेष प्रशिक्षण भी दिया है।
ये राखियां आईसीएआर-राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान, करनाल ने निकरा (जलवायु अनुकूल कृषि पर राष्ट्रीय नवाचार) परियोजना के तहत तैयार की हैं। राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान के निदेशक एवं कुलपति डॉ.धीर सिंह ने बताया कि खासकर अनुसूचित जाति की महिलाओं को 21 से 23 अगस्त तक इन राखियों को बनाने का प्रशिक्षण दिया गया है। जिससे वह इस तकनीक को रोजगार के रूप अपनाकर देसी गाय के गोमय से निर्मित उत्पादों को बनाकर व उन्हें बेचकर अपनी आमदनी में वृद्धि कर सकें।
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निकरा के पीआई एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. आशुतोष ने बताया कि इससे पहले दिवाली के मौके पर गोमय के दीये, गणेश प्रतिमाएं आदि कई तरह के उत्पाद तैयार किए गए थे, लेकिन अब इस प्रशिक्षण में महिला प्रशिक्षणार्थियों को गोमय उत्पादों से संबंधित विभिन्न विषयों पर व्याख्यान व प्रायोगिक कक्षाओं के माध्यम से विस्तार में जानकारी दी गई है। प्रायोगिक कक्षा में सभी प्रशिक्षणार्थियों को गोमय उत्पाद बनाने के लिए विभिन्न घटकों द्वारा मिश्रण तैयार करके सांचों में डालना, श्री गणेश जी की मूर्तियां, विभिन्न प्रकार के दीपकों के साथ-साथ रक्षाबंधन के लिए खासतौर पर गोमय राखियां तैयार करना सिखाया गया है। महिलाओं की ओर से तैयार इन उत्पादों को सूखने के पश्चात इन्हें विभिन्न प्रकार के रंगों द्वारा सजाया गया। इनकी महत्ता को भी समझाया गया कि इन उत्पादों का पर्यावरण को स्वच्छ एवं सुरक्षित रखने के लिए क्या योगदान रहेगा।
प्रधान वैज्ञानिक डॉ. सुनीता मीना ने बताया कि राखियां अभी तक फाइबर, प्लास्टिक आदि से बनाई जा रही हैं, ये उत्पादों को प्रवाहित करने के उपरांत व ज्यों का त्यों रह करके जलाशयों व मिट्टी में प्रदूषण फ़ैलाते हैं। साथ में विभिन्न रसायनों का उत्सर्जन भी करते हैं, जबकि गोमय निर्मित उत्पाद जलाशयों और मिट्टी में जल्द घुल जाते हैं। जीव जंतुओं व अन्य वनस्पति को पोषण देने का कार्य भी करते हैं। पशु शरीर क्रिया विज्ञान के अध्यक्ष डाॅ. अजय कुमार डांग, डेयरी विस्तार विभाग के अध्यक्ष एवं संस्थान के एससीएसपी के नोडल अधिकारी डाॅ. गोपाल सांखला ने भी इन उत्पादों के बारे में मार्गदर्शन किया।
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समूह से जोड़कर महिलाओं को बनाएंगे आत्मनिर्भर
प्रशिक्षण समन्वयक डॉ. सुनीता मीना ने बताया कि संस्थान निदेशक के दिशा निर्देश पर इन महिलाओं को सभी संभव सहायता दी जाएगी। इनका स्वयं सहायता समूह बनवा कर एक स्टार्टअप के रूप में इस कार्य को आगे बढ़ाया जाएगा ताकि इन महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया जा सके। गोमय उत्पादों का प्रयोग पशु अपशिष्ट प्रबंधन करने के साथ-साथ स्वच्छ भारत अभियान में भी सहायक होंगे।
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