राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) ने जलवायु परिवर्तन की मध्य भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप जीनोमिक सलेक्शन मॉडल (सिंगल स्टेप जीनोमिक बीएलयूपी) विकसित किया है। इससे सात साल में पूरी होने वाली दुधारू सांड़ की पहचान सिर्फ एक माह में पूरी की जा सकेगी।
जलवायु परिवर्तन के दौर में देसी नस्लें ही दूध का उत्पादन बनाए रखने में सक्षम हैं। इसके लिए राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) ने जलवायु परिवर्तन की मध्य भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप जीनोमिक सलेक्शन मॉडल (सिंगल स्टेप जीनोमिक बीएलयूपी) विकसित किया है। इससे सात साल में पूरी होने वाली दुधारू सांड़ की पहचान सिर्फ एक माह में पूरी की जा सकेगी।
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इस मॉडल से देश की सर्वाधिक दूध देने वाली देसी नस्ल शाहीवाल पर नस्ल सुधार कार्य शुरू कर दिया गया है। एनडीआरआई के निदेशक डॉ. धीर सिंह ने बताया कि अब तक देश में फीनो टाइप पद्धति से दुधारू सांड़ का चयन होता था। इसमें पशु का रंगरूप, लंबाई, ऊंचाई, दूध की मात्रा, वंशावली देखी जाती थी।
इसमें करीब सात साल का समय लग जाता था लेकिन कुछ समय से देश में जीनो टाइप सलेक्शन (जीन आधारित) चयन भी होने लगा है। वर्तमान में राष्ट्रीय गोकुल मिशन के अंतर्गत पशुपालन, डेयरी एवं मत्स्य पालन विभाग (डीएएचडी), राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) व राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो ने देसी नस्लों के सांड़ों का चयन डीबीएलयूपी तकनीक से शुरू किया है लेकिन एनडीआरआई की ओर से विकसित मॉडल इनसे अलग है।
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इसमें भारतीय परिस्थितियों में जीनो टाइप, फीनो टाइप के साथ वंशावली को भी जोड़ा गया है, जो सिंगल स्टिक है। इससे सटीक जानकारी सिर्फ 30 दिनों में मिल जाएगी। इससे दूध उत्पादन क्षमता में वृद्धि, तीव्र आनुवंशिक सुधार और विशेष रूप से छोटे व मध्यम डेयरी किसानों के लिए आर्थिक लाभ सुनिश्चित होंगे।